"क" को क्या कहकर पुकारूँ?
अच्छा अब यहाँ से सोचना शुरू कीजिए । भगवान श्री कृष्ण की बाल लीला एक अंश देखिए । माता यशोदा ने कान्हा को नहला धुलाकर , साफ सुंदर कपड़े पहनाए । तेल , फुलेल लगाया । चोटी बनाई । काला टीका लगाया , किसी की नज़र न लगे । और फिर माखन चुपड़कर हाथ में रोटी पकड़ा दिया । लो खाओ । कान्हा खाने लगे । मस्ती में ठुमक ठुमक कर । क्या पता कागभुसुंडी महराज पहले से आँख गड़ाए बैठे हैं । रोटी पर नहीं कान्हा पर । वो क्यों भला ।
साहित्य

12:50 PM, August 27, 2025
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रामजी प्रसाद " भैरव "
रामजी प्रसाद " भैरव " ललित निबन्ध
कितनी बे सिर पैर की बात है । भला यह भी कोई बात है । बात की बात में किसी ने पूछ दिया । " क " को क्या कहकर पुकारूँ । उसके प्रश्न पर मेरा जी जल गया । खोपड़ी सुलग उठी । मन में आया कि कान के नीचे एक पड़ाका जड़ दूँ । होश ठिकाने आ जाय बेहूदे इंसान का । आप ही सोचिए भला यह भी कोई प्रश्न है । मूर्खता से भरा हुआ । पूछ रहा है कि " क" को क्या कहकर पुकारूँ । क्यों तुम्हें स्कूल में क का मतलब नहीं बताया गया था । अरे .. ये क्या । इसका प्रश्न तो एकदम ठीक है । मुझे तो पहली बार क से कौआ पढ़ाया गया था । थोड़ा बड़ा हुआ तो पता चला कि क से केला भी होता है । क से कबूतर या फिर कुछ भी जिससे क से सम्बंध निकल आये । आप पुकार सकते हैं । लेकिन क्या यह ठीक होगा । आखिर पंडी जी ने इतना जोर देकर क से कौआ ही क्यों पढ़ाया । कुछ और भी तो पढ़ा सकते थे । मगर इसमें उनका कोई दोष नहीं । उन्होंने एकदम सही पढ़ाया था । सौ फीसद सच्चा और खरा । मुझे लगता इसमें बहुत बड़ा मनोविज्ञान छिपा है । क्यों बच्चों को पढ़ाते समय क का मतलब कौआ ही बताया जाता है । कुछ और क्यों नहीं । आखिर उसका प्रश्न भी तो यही था ।
अच्छा अब यहाँ से सोचना शुरू कीजिए । भगवान श्री कृष्ण की बाल लीला एक अंश देखिए । माता यशोदा ने कान्हा को नहला धुलाकर , साफ सुंदर कपड़े पहनाए । तेल , फुलेल लगाया । चोटी बनाई । काला टीका लगाया , किसी की नज़र न लगे । और फिर माखन चुपड़कर हाथ में रोटी पकड़ा दिया । लो खाओ । कान्हा खाने लगे । मस्ती में ठुमक ठुमक कर । क्या पता कागभुसुंडी महराज पहले से आँख गड़ाए बैठे हैं । रोटी पर नहीं कान्हा पर । वो क्यों भला । अरे बुद्धू इतना भी नहीं जान पाए । अपनी शंका मिटाने के लिए । क्या यही वह परमब्रह्म परमेश्वर है । जो सारी दुनियाँ को रोटी देता है । सृष्टि को चलाता है । नहीं ऐसा नहीं हो सकता । चलो चलकर देखूँ तो जरा । सच है या कोरी अफ़वाह । और उन्होंने कान्हा के हाथ से रोटी छीन लिया । मूर्ख कौआ । किससे बैर ठान लिया । त्रिलोकीनाथ से । बड़ा जुलुम किया अभागे ने ।
" काग के भाग बड़ो सजनी , हरि हाथ सो ले गयो माखन रोटी ।" पहले तो लगा कौआ मूर्ख है , ऐसी गलती कर बैठा , लेकिन नहीं । वह भग्यशाली निकला । भगवान भी कहाँ मानने वाले , रोटी छीनने ने लिए हाथ बढ़ाया । कागभुसुंडी महराज को भागते भागते जान पर बन आयी । भगवान की लीला का आनंद सभी देवता ले रहे थे । कान्हा का हाथ उनका पीछा ही नहीं छोड़ रहा था । गलती तो हो गयी । पछता रहे हैं कागभुसुंडी , मग़र करें क्या । कहीं गर्दन पकड़ लिया तो मरोड़कर फेंक देंगे । अननाहक जान जाएगी । लगे त्राहि माम् करने । परन्तु बीच में पड़ने की किसकी हिम्मत । सारे देवता कागभुसुंडी के मूर्खता पर हँस रहे थे । थक हार कर वापस लौटे , रोटी वापस दिया । चरणों गिर कर क्षमा माँगी ।
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क्या क से कौआ पढ़ाने के पीछे यही असली मनोविज्ञान था । कौआ ही पहला पक्षी है जो सबसे पहले बच्चों को अपने मुंडेर पर कांव कांव करता दिख जाता है । मां बच्चे को रोटी देकर पहला पाठ पढ़ाती है । सावधानी से खाना , नहीं तो कौआ छीन लेगा । बच्चा भी कौवे से सावधान हो उठता है । उसी कौवे का परिचय जब पंडी जी एक आकृति से कराते है तो वह सहज ही अपनी स्मृति में बैठा लेता है । कौआ उसे जीवन भर स्मरण रहता है । इसे छोड़िए , कौवे को लेकर एक पर्व निर्धारित है । उस दिन कौआ महराज को खूब अच्छे अच्छे पकवान खाने को मिलते हैं । न दिखाई पड़ने पर मनावन करना पड़ता है । मान्यता है उस दिन पितर कौआ के रूप में पधारते हैं । हिन्दू धर्म की इस मान्यता के अनुसार पितरों का एक दिन निर्धारित किया गया है । उनका आना समृद्धि सूचक होता है । उस दिन उसके सारे दोष भुला दिए जाते हैं । वैसे कौआ बड़ा उपेक्षित पक्षी है । लोग उसे देखना पसंद नहीं करते । बहुत दृष्टि दौड़ाने पर यह समझ में आता है । यह मांस और गू खाने वाला पक्षी है । मगर एक दूसरी बात भी याद आती है । रामायण के अनुसार इंद्र का पुत्र जयंत कौवे का वेश बनाकर धरती पर आया । उस समय राम को चौदह साल का वनवास मिला था । साथ में उनकी पत्नी सीता और लक्ष्मण जी भी चले आये थे । जयंत जिस समय उनके पास आया , लक्ष्मण जी नहीं थे । राम जी सीता जी के गोंद में सिर रखकर सोए थे । जयंत ने बड़ी धृष्टता की , दुस्साहस किया । अमर्यादित आचरण किया । उसने सीता जी के स्तन और पैरों में चोंच मार दिया । और भाग खड़ा हुआ । सीता जी विचलित हो उठी । वैसे इस प्रसंग को तुलसीदास ने मर्यादित बनाने के लिए केवल चरण का ही उल्लेख किया है । खैर , बात यह हुई कि प्रभु श्री राम ने जयंत के इस आचरण से छुब्ध होकर तिनके का बाण बनाकर चला दिया । कौवे ने देखा एक बाण सनसनाता हुआ उसकी ओर चला आ रहा है । वह शक्ति भर भागने लगा । वह जहाँ जहाँ जाता बाण उसका पीछा करता । वह भयभीत हो उठा । वह देव लोक के सारे देवताओं से राम के बाण से बचाने की गुहार लगाई । लेकिन सबने राम के बाण से उसे बचाने से मना कर दिया । जयंत थक हार कर राम का शरणागत हुआ । अपने किये की क्षमा माँगी । राम ने दण्ड स्वरूप उसकी एक आँख फोड़कर काना बना कर छोड़ दिया । तब से आज तक हर कौवा एक आँख का काना बना घूम रहा है । कौवे की उपेक्षा का एक कारण यह भी हो सकता है । हिंदी वर्णमाला में किसी बच्चे को अक्षर पहचान अ की बजाय क से कराया जाता है । इसके पीछे मुझे यही मनोविज्ञान लगता कि अ से अनार का परिचय पाने से काफी पूर्व बच्चा कौवे से परिचित हो जाता है । हमारे यहाँ गाँवों में अब भी कौवे की बोली सुनकर किसी मेहमान के आने का संकेत समझा जाता है । कौआ उपेक्षित होकर भी आत्मीय होता है । साहित्य में विरहणी नायिका अपने प्रिय के आने की मनौती कौवे से माँगती हैं और आश्वासन देती हैं , तुम्हारी चोंच सोने से मढ़वा दूँगी । मैंने खुद बचपन में कौवे को नथिया पहने देखा है । हो सकता है यदा कदा अब भी कोई कोई स्त्री ऐसा करती हो । कौवे का स्वर अच्छा नहीं माना जाता । उसकी बोली कर्कश है । अप्रिय है । कर्ण प्रिय नहीं है । कौआ प्रायः उपेक्षित रहने वाला है । उसकी उपेक्षा उसके स्वभाव के कारण होती है । उसे व्यवहारिक रूप से चंठ भी कहा जाता है । उसके द्वारा किसी खाद्य सामग्री को जूठा कर देने पर निष्प्रयोज्य हो जाता है । मुझे याद है बचपन में मेरे आजा ( परदादा) को नहाने के लिए रखे पानी को कौवे द्वारा जुठार देने पर , नाराजगी व्यक्त करते हुए पानी फेंकवा दिए । जब कि उस समय पानी कुएँ से आता था । मैं क का दुर्भाग्य तो नहीं कहूँगा लेकिन कौवे का दुर्भाग्य जरूर कहूँगा । क्योंकि उसकी तुलना कोयल से की जाती है । कहाँ कोयल की सुरीली तान , कहाँ कौवे की कर्कश ध्वनि । दोनों में जमीन आसमान का अंतर है । यह अंतर यहीं खत्म नहीं होता । बल्कि कौवे के स्वार्थी होने का प्रमाण भी बनता है । कौआ अपने बच्चे खुद नहीं पालता , वह अपने अंडे कोयल के खोते में रख देता है । बेचारी कोयल ठहरी सीधी साधी वह कौवे के अंडे को अपना अंडा समझकर जतन करती है । समय आने पर जब उससे चूजे निकलते हैं । तो वह कोयल के बच्चों की तरह काले होते हैं । कोयल कौवे के छल को समझ नहीं पाती और उसे अपना बच्चा समझ कर पालती है। यह रहस्य खुलता भी तब है , जब कौवे के बच्चे कर्कश ध्वनि में बोलते हैं । कौवे से जुड़ी इतनी बातें हैं कि किसी बच्चे के मानस पटल पर सहजता से अंकित होना स्वाभाविक है । कोई बच्चा जब पहली बार कौवे की कांव कांव सुनता है तो वह मुग्ध हो उठता है । क्योंकि वह बेसुरा तान प्रभात के साथ ही सुनने को मिलती है । दूसरे वह सहजता से रोज उपलब्ध होने वाला पक्षी है । किसी अबोध बच्चे को उसके बेसुरे होने का अनुमान हो न हो परन्तु , उसे आनन्द तो पहुंचा ही आता है । शायद ही कोई ऐसा बच्चा हो जो कौवे को बचपन में देर तक निहारा न हो । बच्चा कौवे का गुण दोष परखे बिना ही उसका आत्मीय हो उठता है । यही वजह जब स्कूल में पहली बार किसी आड़ी तिरक्षी लकीर को कौवा शब्द से सम्बोधित किया जाता है तो बच्चा कौतूहल से उन लकीरों में कौवे की आकृति तलाशता है । कुछ ही दिनों में उसका विश्वास पुष्ट हो जाता है कि यही कौआ क है ।
बरबस ही मुझे एक प्रसंग स्मरण हो आ रहा है , जिसे सुनकर शायद आप का भी विश्वास दृढ़ हो जाय । बात यह है कि किसी गाँव में रोज राम कथा कहने की परंपरा थी , जिसे कोई न कोई पढ़कर सुनाता था , कुछ भक्त लोग राम कथा का आनन्द लेते । एक दिन हुआ यह कि उस गाँव में किसी के दामाद आये । लोगों ने आग्रह किया आज की कथा दमाद जी सुनाएंगे । दमाद जी ने बड़ा ना नुकुर किया , लेकिन गाँव वाले सहमत न हुए । थक हार दमाद जी ने मौन सहमति दे दी । नियत समय पर गाँव के लोग इकठ्ठा हुए , उसमें स्त्री और पुरुष , बालक , वृद्ध सब थे । मजे की बात यह थी कि दमाद जी की सास , स्वसुर और बेटी भी कथा में उपस्थित थे । एक चौकी पर गद्दा बिछा कर आसन लगा दिया गया । राम चरित मानस रेहल पर रख कर , धूप अगरबत्ती वगैरह जला दिया गया । पूरा वातावरण भक्तिमय था । दमाद जी चौकी पर बैठे तो थोड़ी दुविधा में आ गए , लोगों ने कहा -" अब शुरू करिए , सब लोग आ गए हैं ।"
दमाद जी ने पुस्तक के बीच में हाथ डालकर किताब खोला , लोग बड़ी उत्कंठा से उनकी ओर देख रहे थे । अचानक दमाद जी ऊँगली एक जगह ठहर गयी , और लगे सिसक सिसक कर रोने, उनको रोता देख सास की आँखों में आँसू आ गए , वह भी रोने लगी । मां को रोता देख बेटी रोने लगी । मां बेटी को रोता देख , गाँव की स्त्रीयाँ रोने लगी । यह देख सभी पुरुष भी रोने लगे । पूरा गाँव भाव विह्वल होकर रो रहा था । अचानक एक व्यक्ति बोला -" भाई देखो तो जरा , कौन सा ऐसा प्रसंग है कि दमाद जी बिना एक शब्द बोले पूरे गाँव को रुला दिए । " एक व्यक्ति ने देखा तो राम वन गमन का प्रसंग खुला हुआ था । लोग फुसफुसाए भाई प्रसंग ही ऐसा है कि दमाद जी रो दिए । जब पूरी अयोध्या रो रही है राम के वियोग तो हम लोगों की बात ही क्या है ।
दमाद जी चिल्लाए -" नहीं भाइयों , ऐसी बात नहीं है । जब मैं पहली बार स्कूल गया तो मास्टर साहब ने कौआ क , बहुत बड़ा लिखा था । मैं खुश था कौआ क इतना बड़ा होता है । उस दिन के बाद मैंने आज देखा तो आँसू निकल आये , बेचारा कितना छोटा हो गया है । "
लोग समझ गए , यह तो पूरा बौड़म है । इसे हटाओ किसी दूसरे से कथा आगे बढ़ाओ ।