धानापुर में डीएसआर तकनीक पर किसानों को दिया गया प्रशिक्षण, विशेषज्ञों ने बताई आय बढ़ाने की राह
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर पंजाब सिंह रहे, जबकि अध्यक्षता पंतनगर स्थित गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के पूर्व निदेशक प्रोफेसर बी.पी. सिंह ने की। कार्यक्रम का संचालन डॉ. राजेश कुमार सिंह, जनसंपर्क अधिकारी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय ने किया।
चंदौली

4:13 PM, Jun 7, 2026
धानापुर। क्षेत्र में किसानों, मजदूरों, महिलाओं, गरीबों एवं युवाओं के हित में कार्यरत शिवनंदम फॉर्मर्स प्रोड्यूसर कंपनी, खड़ान धानापुर के तत्वावधान तथा फार्ड फाउंडेशन वाराणसी के सौजन्य से सिद्धपीठ खड़ान की तपोभूमि पर धान की सीधी बुआई (डीएसआर) तकनीक विषयक एक दिवसीय प्रशिक्षण एवं जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर पंजाब सिंह रहे, जबकि अध्यक्षता पंतनगर स्थित गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के पूर्व निदेशक प्रोफेसर बी.पी. सिंह ने की। कार्यक्रम का संचालन डॉ. राजेश कुमार सिंह, जनसंपर्क अधिकारी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय ने किया।
कार्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुनील कुमार तथा प्रोफेसर बी.पी. सिंह ने धान की सीधी बुआई (डीएसआर) एवं रोपाई पद्धति के संबंध में किसानों को विस्तृत जानकारी दी। मुख्य अतिथि प्रोफेसर पंजाब सिंह ने किसानों की आय बढ़ाने, कृषि उत्पादों के निर्यात, महिला किसानों एवं मजदूरों को रोजगार उपलब्ध कराने तथा डीएसआर तकनीक से होने वाले लाभों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
कृषि विज्ञान केंद्र चंदौली के अध्यक्ष डॉ. नरेंद्र रघुवंशी ने केंद्र एवं सरकार द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं की जानकारी देते हुए किसानों एवं महिलाओं को प्रशिक्षण, भ्रमण एवं रोजगारोन्मुख कार्यक्रमों से जोड़ने का आश्वासन दिया।
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शिवनंदम फॉर्मर्स प्रोड्यूसर कंपनी के निदेशक रमेश सिंह ने बताया कि फार्ड फाउंडेशन के सहयोग से पिछले चार वर्षों से धानापुर क्षेत्र में डीएसआर तकनीक के माध्यम से किसानों की खेती कराई जा रही है। उन्होंने कहा कि जिन किसानों ने समय पर खरपतवारनाशी दवा का छिड़काव एवं उचित रखरखाव किया, उन्हें बेहतर परिणाम प्राप्त हुए। उन्होंने गुरेहू गांव के किसान दीपक राय का उदाहरण देते हुए बताया कि पिछले वर्ष एक बीघा में डीएसआर तकनीक से खेती करने के बाद इस वर्ष उन्होंने अपनी पूरी पांच एकड़ भूमि में डीएसआर पद्धति अपनाई है तथा धान की नर्सरी नहीं डाली है।
