ताल ठोंक मुद्रा बनाम सुर्ती ठोंक मुद्रा
दूसरी ओर सुर्ती ठोंक मुद्रा के लोग होते हैं । वास्तव में यह ताल ठोंक के विरोधी नहीं हैं । बल्कि एक अलग अस्तित्व रखने वाले लोग हैं । मुझे देवानन्द जी के एक फ़िल्म का गाना याद आ रहा है , उसे सुनकर शायद आप को सुर्ती ठोंक मुद्रा को समझने में सहूलियत मिल जाय ।
साहित्य

7:22 AM, August 29, 2025
- रामजी प्रसाद " भैरव " ललित निबन्ध
ताल ठोंक कर मर्द लोग लड़ते हैं । चाहे कुश्ती का अखाड़ा हो चाहे , राजनीति का । चाहे समाज में । मुँह पर कहना , ताव से कहना इनकी आदत की शुमार में होता हैं । यह मुँह चोर नहीं होते । चेहरे पर एक रुआब हमेशा झलकता है । मर्दानगी पोर पोर से मुखरित होती है । ये बात के पक्के होते हैं । कायरता इनके पास भूलकर भी नहीं फटकती । ताल ठोंक मुद्रा का आदमी सामने वाले के मन में चुपके से ऐसा भय पिरो देता है कि सामने वाला उससे भिड़ने की हिम्मत छोड़ देता है , और यदि कोई भीड़ गया तो करारा जवाब पाकर वह ठंडा भी जल्दी हो जाता है ।
दूसरी ओर सुर्ती ठोंक मुद्रा के लोग होते हैं । वास्तव में यह ताल ठोंक के विरोधी नहीं हैं । बल्कि एक अलग अस्तित्व रखने वाले लोग हैं । मुझे देवानन्द जी के एक फ़िल्म का गाना याद आ रहा है , उसे सुनकर शायद आप को सुर्ती ठोंक मुद्रा को समझने में सहूलियत मिल जाय ।
" मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया ।
हर फिक्र को धुंए में उड़ाता चला गया ।
बरबादियों का शोक मानना फिजूल था
बरबादियों का जश्न मनाता चला गया ।।
Advertisement
साहिर लुधियानवी के इस गीत में जिंदगी का फलसफा तो है ही , लेकिन आप को सुर्ती ठोंक मुद्रा को समझने में आसानी हुई होगी । ये जो सुर्ती ठोंक मुद्रा के प्राणी होते हैं । वे फिक्रमंद लोग नहीं होते । जिंदगी जैसे चल रही है , चल रही है । वे इस बात की चिंता नहीं करते कि उन्हें कोई क्रांति करनी है । किसी भी नुकसान की स्थिति में बहुत दिनों तक छाती पीटने व मातम मनाने की आदत नहीं पालते । इनकी जिंदगी जल्द ही ढ़र्रे पर आ जाती है । ये जीवन को ऐसे जीते हैं जैसे संसार की नश्वरता के सबसे बड़े ज्ञाता यही हों । इन्हें गाँव से लेकर देश विदेश तक कि खबरों का इल्म होता है । गदेली पर सुर्ती मलते मलते , ऐसी गम्भीर भंगिमा बनाते हैं, कि सामने वाले लोग आँख कान फाड़े ऐसे देखते हैं , जैसे उनके मुँह से शब्द नहीं , फूल झड़ेंगे । सुर्ती ठोंक मुद्रा वाले प्राणी चुन चुन कर एक दो ऐसे शब्द उछाल देते हैं , कि सुनने वाला भकुआया सा मुँह बनाये टुकुर टुकुर देखता ही रह जाता है । इनकी शैली ही ऐसी होती है । यह बात को रोचक बनाने में सच में झूठ मिलाने में संकोच नहीं करते । यह लच्छेदार बात करते हैं। मजेदार बात करते हैं । बेपरवाह शैली के ये प्राणी अपने परिचय के मोहताज नहीं होते । यह ऊसर भूमि में फूल खिला सकते हैं । ये जहाँ जाते हैं , जल्द ही अपने विचारों से लोगों को अपना भक्त बना लेते हैं । इनकी सुर्ती ठोंक कर मुँह में दबाने की कला को जरा ध्यान से देखिए , चुटकी भर खैनी लेकर होठों को बाहर खींचकर , होंठ को ऐसे दबाते हैं , जैसे कोई ट्रक ड्राइवर गियर को अपनी जांघ से दबाता है । ये बुरे आदमी नहीं होते , बस अलमस्त होते हैं । शांतिप्रिय होते हैं । किसी से बेवजह लड़ना भिड़ना पसन्द नहीं । ये मसखरी पसंद होते हैं । जिनके पास संस्मरणों , और तरह तरह की कहानियों का पिटारा होता है । बस अवसर पाते ही पिटारा खोल कर बैठ जाते हैं । जैसे जादूगर पिटारे से एक एक चीज निकालता जाता है , और लोगों को आश्चर्य चकित करता जाता है । ठीक वैसे ही सुर्ती ठोंक मुद्रा के प्राणी ।
ताल ठोंक मुद्रा वाले थोड़ी मोटी बुद्धि के होते हैं , बात बात में भिड़ना इनका स्वभाव होता है । इनकी अकड़ मुर्दे की अकड़ से कम नहीं होती । कई पढ़े लिखे लोगों को भी देखा है , ऐन मौके पर उनकी अक्ल घास चरने चली जाती है । काम बिगाड़ने के बाद पछताते हैं । लेकिन उनके लिए यही मसल सही मालूम होती है , "अब पछताए होत क्या , जब चिड़िया चुग गयी खेत ।" ताल ठोंक मुद्रा वाले छोटी छोटी बातों पर भिड़ना जानते हैं । उन्हें बात का समाधान ढूंढना नहीं आता । इनकी बातों में समस्याओं का अंबार होता है । जिसका समाधान एक ही भाषा में जानते हैं । लठ्ठ की भाषा में । इनकी दृष्टि में लड़ाई झगड़ा ही एक मात्र समाधान होता है । कभी कभी ऐसे लोग परिवारिक लोगों के लिए समस्या खड़ी कर देते हैं । वे चैन से दो रोटी खाना चाहते हैं , ये महाशय कहीं से लड़ भिड़ कर थाना कचहरी में फंसा देते हैं । इनकी प्रवृति लड़ाकू होती है । समाज पर इनकी पकड़ अलग तरह की होती है । खाशकर अपने प्रवृति के लोगों के लोगों के बीच ही इनकी चौकड़ी जमती है । ये थोड़े कानून के जानकार होते हैं । जिनके पास भोले भाले लोग कानूनी सलाह के लिए आते हैं । ताल ठोंक वालों की एक बड़ी खाशियत होती है , कि ये अपनी कौल के पक्के होते हैं । जिस ओर मोर्चा खोल देते हैं । उसी ओर रहते हैं । चाहे दुनियाँ इधर से उधर हो जाय । ये मन के अच्छे होते हैं । जल्दी किसी की बुराई नहीं करते ।
अब फिर आते हैं सुर्ती ठोंक मुद्रा वालों पर , देखिए एक प्रचलित उक्ति है । " अस्सी चुटकी नब्बे ताल , रगड़ के बीड़ा मुँह में डाल । " एक बात आप ने भी गौर किया होगा । सुर्ती खाने वाले गदेली पर सुर्ती मलते मलते खेत घूम आते हैं । लोगों से कुशल मंगल कर आते हैं । बाजार हाट कर आते हैं ।
यह कोई बड़ी बात नहीं है । सुर्ती खाने वाले बड़े बड़े काम कर आते है । मसलन सुर्ती के प्रभाव को सत्ता के गलियारे में भी महसूस किया जा सकता । इसका एक नाम चैतन्य चूर्ण भी है । इसको खाने वाले की चेतना जागृत हो जाती है । ऐसी रुढिगत मान्यता है । वैसे चेतना जागृत करने के बहुत सारे उपाय लोगों ने ढूंढ रखा है , जो मेरे बात करने का विषय नहीं है । वैसे एक ऐतिहासिक तथ्य स्मृति में आ रहा है , सोचा लगे हाथ उसकी भी चर्चा कर लूँ । सुर्ती यानि तम्बाकू भारत में पुर्तगालियों की देन है । उन्होंने पुर्तगाल से तम्बाकू लाना शुरू किया , और लोगों के अंदर नशा की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया । तम्बाकू भारत में आने के बाद कई रंग में ढल गयी । उसके इस्तेमाल की विधियां बदल गयीं । हुक्का तम्बाकू उसी का एक रूप है । बीड़ी , सिगरेट , सिगार , पान में पड़ने वाला तम्बाकू आदि जाने क्या क्या । तम्बाकू का सुर्ती नाम क्यों पड़ा , यह भी एक दिलचस्प बात है । दरअसल हुआ यह कि पुर्तगालियों ने कलकत्ते के सूरत नगर में एक बड़ी कोठी बनवाई , जो उनके तम्बाकू का व्यापारिक केंद्र था । भारत के भोले भाले लोग जो तम्बाकू कहने में परेशानी महसूस करते थे , उन्होंने अपनी सहूलियत के लिए सुर्ती कहना शुरू किया । इसका सीधा अर्थ था सूरत वाली । जो तम्बाकू से ज्यादा लोकप्रिय हुई । इससे जुड़ी एक और घटना का जिक्र करना अपना धर्म समझता हूँ । वो यह कि पुर्तगालियों द्वारा भारतीयों के रगों में तम्बाकू का नशा चढ़ाया जा रहा था । जो उनके सिर चढ़कर बोल रहा था । तम्बाकू उनके आमदनी का बड़ा जरिया बन चुका था । पुर्तगालियों के जाने के बाद भी तम्बाकू यानि सुर्ती का व्यापार फलता फूलता रहा । तम्बाकू एक नए रूप में घर घर घुस चुका था । वह था हुक्का तम्बाकू । पता नहीं कैसे लोगों ने उसे अपनी मान प्रतिष्ठा से जोड़ लिया । समय के साथ घरों में हुक्का अनिवार्य अंग बन गया । लोग हुक्का बड़े चाव से पीते थे , पिलाते थे । चाहे गरीब हो या धनवान सब हुक्का पीते थे । हुक्का की लोकप्रियता इतनी बढ़ चुकी थी कि यह सामाजिक मान बन गया । इसका एक रुढिगत रूप भी सामने आता है कि किसी व्यक्ति के आचरण सम्बन्धी दोष आने पर उसका हुक्का पानी बन्द कर , जाति बिरादरी से बाहर कर दिया जाता था । गाँवों में सरपंच या पंचायत को हुक्का तम्बाकू के लिए सम्मान में पैसे भी देते थे , जिससे उनकी प्रतिष्ठा बढ़ती थी । मुग़ल बादशाह शाहजहाँ भरतीय लोगों में पुर्तगालियों द्वारा इस नशा की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी । यहाँ तक कि भरतीयों को तम्बाकू सेवन से बचाने के लिए कड़े कानून बनाएं । साथ ही उसके अनुपालन में सख़्त हिदायत दी , यदि कोई व्यक्ति तम्बाकू यानी सुर्ती खाते पकड़ा जाए तो उसके होंठ काट लिए जाएं । इतनी कठोर वर्जना के बाद भी तम्बाकू आजादी के सालों साल तक उसी रूप में लोकप्रिय बना रहा ।
सुर्ती की इसी लोक प्रतिष्ठा ने एक नए प्रजाति को जन्म दिया , जिसे सुर्ती ठोंक मुद्रा कहा जाता है । आज समाज में आप को सुर्ती खाने वाले लोग सहजता से मिल जायेंगे । सुर्ती उनके जीवन का अभिन्न अंग है । सुर्ती माँग कर खाने वालों की भी अच्छी खासी संख्या है । इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ताल ठोंक मुद्रा वालों की अपेक्षा सुर्ती ठोंक मुद्रा वाले लोग ज्यादा हैं । इनकी भाषा में लालित्य झलकता है । सुर्ती न मिलने पर कहते हैं , सुर्ती बिना तारू चटकत हौ मरदे । सुर्ती के शौकीन लोग स्थान बदल बदल कर खाते हैं । कुछ निचले होंठ में दबाते हैं , तो कुछ लोग ऊपरी होंठ में , तो कुछ दोनों गाल में बारी बारी से । उनके सुर्ती खाने की स्टाइल पर निर्भर करता है । वो कैसे खाते हैं । सुर्ती की बहुत सारी किस्में बाजारों में उपलब्ध है । एक बिहार प्रान्त की सुर्ती भी बहुत मशहूर है । सुर्ती का एक नाम खैनी भी प्रचलित है । यह भी हो सकता है , खैनी अन्य प्रांतों में अलग अलग नामों से जानी जाती हो । जो भी हो सुर्ती ठोंक मुद्रा सभी मुद्राओं पर भारी है । बिना दाम वाला भी इसका सुख भोग सकता है । आनन्द ले सकता है ।

रामजी प्रसाद "भैरव"