करो या मरो के कहानीकार क्रांतिवीर कामता प्रसाद विद्यार्थी
देश आजादी का 80 वां वर्ष मनाने को तैयार है। आठ अगस्त से जनपद में राजनीतिक ,सामाजिक और सरकारी संस्थान तिरंगा यात्रा निकाल देश भक्ति से ओत प्रोत है।देश की आज़ादी में जनपद की कहानी निराली है। देश में सबसे पहले तिरंगा धानापुर थाने पर फहराए गया। इसके नायक रहे क्रांति वीर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कामता प्रसाद विद्यार्थी। उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के धानापुर कांड (1942) के महान नायक और पहले विधायक थे
धानापुर, चंदौली

क्रांतिवीर कामता प्रसाद विद्यार्थी
6:40 PM, Aug 13, 2026
चंदौली। देश आजादी का 80 वां वर्ष मनाने को तैयार है। आठ अगस्त से जनपद में राजनीतिक ,सामाजिक और सरकारी संस्थान तिरंगा यात्रा निकाल देश भक्ति से ओत प्रोत है।देश की आज़ादी में जनपद की कहानी निराली है। देश में सबसे पहले तिरंगा धानापुर थाने पर फहराए गया। इसके नायक रहे क्रांति वीर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कामता प्रसाद विद्यार्थी। उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के धानापुर कांड (1942) के महान नायक और पहले विधायक थे। उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजों को ललकार कर धानापुर थाने पर तिरंगा फहराया था। बाद में वे क्षेत्र के विकास और शिक्षा के लिए समर्पित रहे। चंदौली जिले के हेतमपुर गांव में हुआ था।धानापुर कांड (1942): महात्मा गांधी के 'करो या मरो' आह्वान पर उन्होंने अगस्त 1942 के आंदोलन में अहम भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने धानापुर थाने पर तिरंगा फहराया था।देश की आजादी के बाद वे कांग्रेस पार्टी के टिकट पर धानापुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़े और लगातार 10 वर्षों तक क्षेत्र के पहले विधायक रहे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कामता प्रसाद विद्यार्थी महाईच के गांवों में घूम-घुम कर लोगों को प्रोत्साहित कर रहे थे, 15 अगस्त 1942 को राजनारायण सिंह और केदार सिंह ने धानापुर पहुंच कर थानेदार को शान्तिपूर्वक तिरंगा फहराने के लिए समझाया मगर ब्रिटिश गुलामी में जकड़ा थानेदार किसी भी हाल में तिरंगा फहराने को राजी नहीं हुआ। तब जाकर 16 अगस्त 1942 को पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार महाईच परगना के लोग सुबह से ही कालिया साहब की छावनी पर एकत्र होने लगे। सरकारी गजट के मुताबिक आंदोलनकारियों की संख्या प्रातः 11 बजे तक एक हजार और तीन बजे तक पांच हजार तक पहुंच गई थी। तीन बजे के करीब विद्यार्थी जी, राजनारायण सिंह, मन्नी सिंह, हरिनारायण अग्रहरी, हरि सिंह, मुसाफिर सिंह, भोला सिंह, राम प्रसाद मल्लाह आदि के नेतृत्च में करीब पांच हजार लोगों का समूह ब्रिटिश थाने की तरफ बढ़ा।
बाजार में विद्यार्थी जी ने लोगों से निवेदन किया कि वे अपनी-अपनी लाठियां रखकर खाली हाथ थाने पर झण्डा फहराने चलें क्योंकि हमारा आन्दोलन अहिंसक है। पलक झपकते ही आजादी के खुमार में आह्लादित जनता थाने के सामने पाकड़ के सामने पहुंच गयी। महाईच परगना के सभी गांव के चौकीदार लाल पगड़ी बांधे बावर्दी लाठियों के साथ तैनात थे। उनके ठीक पीछे 7-8 सिपाही बंदूकें ताने खड़े थे और इनका नेतृत्व थानेदार अनवारूल हक नंगी पिस्तौल लिए नीम के पेड़ के नीचे चक्कर काटकर कर रहा था। थाने का लोहे का मुख्य गेट बन्द था।
राजनारायण सिंह ने थानेदार से शान्तिपूर्वक झण्डा फहराने का निवेदन किया, लेकिन वह तैयार नहीं हुआ। थानेदार ने आंदोलनकारियों को चेतावनी देते हुए कहा कि झण्डा फहराने की जो जुर्रत करेगा उसे गोलियों से भून दिया जायेगा। इतना सुनना था कि कामता प्रसाद विद्यार्थी ने उसे ललकारते हुए लोगों से कहा कि ‘आगे बढ़ो और तिरंगा फहराओ, आने वाले दिनों में नायक वही होगा जो झण्डा फहरायेगा।' इसके बाद वे स्वयं तिरंगा लेकर अपने साथियों के साथ थाना भवन की तरफ बढ़े।
कामता प्रसाद विद्यार्थी के साथ रघुनाथ सिंह, हीरा सिंह, महंगू सिंह, रामाधार कुम्हार, हरिनारायण अग्रहरी, राम प्रसाद मल्लाह और शिवमंगल यादव आदि थे। ज्यों ही इन लोगों ने लोहे का सलाखेदार गेट कूद कर थाने में प्रवेश किया त्यों ही थानेदार ने सिपाहियों को आदेश दिया 'फायर' और उसने पिस्तौल से हमला बोल दिया। गोली विद्यार्थीजी के बगल से होती हुयी रघुनाथ सिंह को जा लगी। पलक झपकते ही विद्यार्थीजी ने झण्डा फहरा दिया। तब क्या था कि बन्दूकें गरज रहीं थीं और गोलियां भारत मां के वीर सपूतों के सीनों को चीरती हुई निकल रहीं थीं। सीताराम कोईरी, रामा सिंह, विश्वनाथ कलवार, सत्यनारायण सिंह आदि गम्भीर रूप से घायल हो गए और हीरा सिंह और रघुनाथ सिंह मौके पर ही शहीद हो गए, मगर यह आंदोलनकारी जांबाज़ तिरंगा फहराने में कामयाब हुए।
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अब तक की घटना जनता मूक दर्शक बनकर देख रही थी मगर भारत माता के वीर सपूतों को तड़पता देख उससे रहा नहीं गया। राजनारायण सिंह का आदेश पाकर हरिनारायण अग्रहरी ने कुशलता पूर्वक थानेदार को पीछे से बाहों में जकड़ लिया और पास ही खड़े शिवमंगल यादव ने थानेदार के सिर पर लाठी का भरपूर वार किया। इससे घबराया थानेदार जान बचाने के लिए अपने आवास की तरफ भागा मगर आजादी के मतवालेपन में डूबी और क्रोध से तमतमाई जनता ने उसे वहीं धराशायी कर दिया। अब तो आन्दोलन अहिंसक हो चुका था, उसकी धधकती ज्वाला में हेड कांस्टेबिल अबुल खैर, मुंशी वसीम अहमद और कांस्टेबिल अब्बास अहमद को मौत के घाट उतार दिया। बाकी सिपाही और चौकीदार स्थानीय होने की वजह से भागने में कामयाब हुये।
तिरंगा अपनी शान से लहरा रहा था। क्रांतिकारियों ने थोड़ी देर बाद थाने के सभी सरकारी कागजातों और सामान, मेज-कुर्सियों को इकठ्ठा कर थानेदार और उन तीनों सिपाहियों की लाशों को उसी में रखकर जला दिया। आजादी के मतवालों का जूलूस निकला और उन्होंने काली हाउस एवं पोस्ट ऑफिस पर भी तिरंगा फहरा दिया। तकरीबन रात आठ बजे क्रांतिकारियों ने अधजली लाशों को बोरे में भर कर गंगा की उफनती धाराओं में प्रवाहित कर दिया। बरसात की काली रात में गम्भीर रूप से घायल महंगू सिंह को इलाज के वास्ते पालकी पर बिठा कर कामता प्रसाद विद्यार्थी और अन्य लोग 13 किलोमीटर दूर सकलडीहां डिस्पेंसरी पहुंचे मगर गम्भीर रूप से घायल भारत माता के वीर सपूत महंगू सिंह ने भी दम तोड़ दिया। इस तरह 17 और 18 अगस्त तक धानापुर समेत पूरी महाईच की जनता ब्रिटिश हुकूमत की गुलामी से आजाद थी। सत्रह अगस्त तक यह कांड प्रदेश और देश में गूंज उठा।
