कहानी : टूटी चप्पल और अधूरे सपने
गाँव की पगडंडियों पर चलती हुई बारह साल का मासूम "आरिफ़" की टूटी चप्पल हर कदम पर उसे चुभती थी। बरसात में कीचड़ से सने रास्ते और पैरों में चुभते कंकड़ उसकी तक़लीफ़ और भी बढ़ा देते। मगर उसकी आँखों में चमक थी — पढ़ाई की चमक, आगे बढ़ने की तड़प।
उत्तर प्रदेश

1:31 PM, August 21, 2025
गाँव की पगडंडियों पर चलती हुई बारह साल का मासूम "आरिफ़" की टूटी चप्पल हर कदम पर उसे चुभती थी। बरसात में कीचड़ से सने रास्ते और पैरों में चुभते कंकड़ उसकी तक़लीफ़ और भी बढ़ा देते। मगर उसकी आँखों में चमक थी — पढ़ाई की चमक, आगे बढ़ने की तड़प।
आरिफ़ का बाप मज़दूरी करता था। दिन भर ईंट-भट्ठे पर पसीना बहाने के बाद भी घर में इतना ही आता कि दो वक्त का खाना जैसे-तैसे बन जाए। माँ बीमार रहती थी, लेकिन फिर भी चूल्हा जलाने और बच्चों की देखभाल में लगी रहती। ऐसे माहौल में अक्सर बच्चों के सपने अधूरे रह जाते हैं। मगर आरिफ़ का सपना अधूरा रहने से इनकार करता था।
गाँव के सरकारी स्कूल में वह रोज़ सबसे पहले पहुँचता। कभी बस्ता नहीं होता, किताबें आधी-टूटी-फटी होतीं, लेकिन आँखों में उम्मीद का आसमान भरा रहता। मास्टर साहब कहते —
“देखना, ये लड़का एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा।”
मगर गाँव की सोच इतनी आसान कहाँ! बच्चे हँसते —
“अबे, बड़ा अफसर बनेगा तू? पहले चप्पल तो पूरी पहन ले।”
हँसी ठिठोली के बीच आरिफ़ के होंठ चुप रहते, लेकिन दिल में एक आग सुलगती।
शाम को जब बाप थका-हारा घर लौटता, तो अक्सर कहता —
“बेटा, पढ़ाई-लिखाई सब अमीरों का खेल है। हमें तो मज़दूरी ही करनी है। स्कूल का चक्कर छोड़ दे।”
लेकिन माँ के कमजोर हाथ बेटे के सिर पर पड़ते तो जैसे नई ताक़त मिल जाती।
“नहीं, मेरा बेटा पढ़ेगा... चाहे भूखे रहना पड़े।”
धीरे-धीरे हालात और तंग होने लगे। कई बार आरिफ़ को भूखे पेट सोना पड़ा। कई दफ़ा किताबें ख़रीदने के लिए माँ ने अपने गहने तक बेच दिए। लेकिन सबसे मुश्किल वह दिन था, जब स्कूल की परीक्षा से एक दिन पहले उसकी चप्पल पूरी तरह टूट गई।
Advertisement
सुबह वह नंगे पैर स्कूल पहुँचा। रास्ते के काँटों ने पैर लहूलुहान कर दिए। क्लास में बैठा तो कई बच्चों ने फिर हँसी उड़ाई। मगर मास्टर साहब ने उसकी आँखों में देखा —
“बेटा, हिम्मत मत हार। ज़िन्दगी की असली जीत इन्हीं तक़लीफ़ों से निकलती है।”
परीक्षा हुई, नंगे पैर लड़का लिखता रहा। और जब नतीजे आए तो पूरे स्कूल में वही टॉपर था।
गाँव के चौपाल पर सबको यह ख़बर मिली। लोग हैरत में पड़ गए कि वही टूटी चप्पल वाला बच्चा सबको पीछे छोड़ गया। जो बच्चे कल तक हँसी उड़ाते थे, आज तालियाँ बजा रहे थे। बाप की आँखों में आँसू थे, माँ की दुआएँ पूरी हुईं।
आरिफ़ ने साबित कर दिया कि गरीबी सपनों की दुश्मन नहीं, बल्कि असली साथी है — बशर्ते हिम्मत और जज़्बा कायम रहे।
यह कहानी किसी एक आरिफ़ की नहीं है। यह हर उस बच्चे की है, जो टूटी चप्पलों, खाली पेट और तानों के बीच भी सपने देखता है। यह हर उस माँ की है, जो भूखी रहकर भी बेटे की किताब ख़रीदने की जिद नहीं छोड़ती। और यह हर उस बाप की है, जो भले हालात से हार जाए, लेकिन बेटे की मेहनत देखकर गर्व से सिर ऊँचा कर ले।
समाज को यह समझना होगा कि शिक्षा ही वह हथियार है, जो गरीबी और पिछड़ेपन की जंजीरें तोड़ सकता है। अगर हम हर “आरिफ़” की मदद करें, हर टूटी चप्पल वाले बच्चे को किताब थमाएँ, तो शायद कल का भारत और रोशन हो सके।

एम. अफसर खान
( लेखक स्तंभकार, पत्रकार, समीक्षक एवं साहित्यकार हैं)