"औपन्यासिक कला का अद्वितीय उपन्यास है शबरी " - - -शिवकुमार पराग-
शबरी साहसी और निडर बालिका है. उसका व्यक्तित्व नैतिकतापूर्ण व दृढ़ है. वह निडर होकर जंगल में निकल पड़ती है सखियों के संग. जिधर जाने से सखियां काँपती हैं, उस ओर शबरी निधड़क चली जाती है. गहन से गहनतर जंगली रास्तों, हिंसक पशुओं की आमद वाले इलाकों में भी वह बेहिचक परिभ्रमण करती है. इसी परिभ्रमण के दौरान उसे भालुओं का सामना करना पड़ा है जिसने उसकी एक सखी को दबोच लिया था. शबरी अपने चाकू के ताबड़तोड़ प्रह

रामजी प्रसाद "भैरव"
7:20 AM, Dec 18, 2025
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श्री रामजी प्रसाद 'भैरव' एक सिद्धहस्त कथाकार हैं. 'शबरी' उपन्यास में उन्होंने शबरी के समय और परिवेश को जिस जीवंतता के साथ वर्तमान में उतारा है, वह काबिले- तारीफ़ है. पौराणिक या मिथकीय चरित्रों को लेकर लिखे जाने वाले उपन्यासों में तत्कालीन समय और परिवेश को सृजित करना एक बड़ी चुनौती होता है. भैरव जी ने इस चुनौती को स्वीकारा भी है और इस परीक्षा में खरे भी उतरे हैं. इस क्रम में, उदाहरण के तौर पर, जंगली पेड़-पौधों का यह वर्णन देखिए --"मूर्ति पुनः पोटली में रखी और चल दी ऋषि कुमारों के बताये मार्ग पर. रास्ते में तरह-तरह के वृक्ष देखने को मिले. अंकोल, कुरंट,सेमल, परिभद्रक, चिरिविल, महुआ, बेंत, तिलक, नागकेशर, अशोक, तमाल, पाटल, कटहल, ढाक, आम, अर्जुन, उद्दालक, शिरीष, शीशम,पलाश, तिनिश, नक्तमाल, चंदन, स्पंदन, हितांल के अलावा जगह-जगह मार्गों के किनारे बासंती लताएं भी पुष्पों से सुसज्जित हो सुगंध बिखेर रही हैं. शबरी ऋषि मतंग के आश्रम की ओर चलती रही."
शबरी शबर नामक एक जंगली कबीले की लड़की है, जिसके व्यक्तित्व का, चरित्र का क्रमिक विकास उपन्यासकार ने बहुत अच्छे ढंग से दिखलाया है. सर्वप्रथम, शबरी की बाल-सुलभ उत्कंठाएं सामने आती हैं, जिनका समाधान उसके पिता करते हैं, जो शबर कबीले के सरदार हैं एवं कबीले के लोगों के विवादों को पंचायत में सुनते हैं, सुलझाते हैं. ऐसी आत्मीय छत्र-छाया में शबरी पलती- बढ़ती है. पिता से उसे संसार और संस्कारों के बारे में जानने के मौके मिलते हैं. देवताओं के बारे में प्रचलित बहुश्रुतियों से भी वह यथाशक्ति परिचित होती जाती है. हालांकि उसकी माँ उसके होश सम्हालने के पहले ही चल बसी है और उसे विधिवत् शिक्षा नहीं मिल पाई है, तथापि वह पिता एवं काकी के स्नेह के सहारे आगे बढ़ती जाती है.
शबरी साहसी और निडर बालिका है. उसका व्यक्तित्व नैतिकतापूर्ण व दृढ़ है. वह निडर होकर जंगल में निकल पड़ती है सखियों के संग. जिधर जाने से सखियां काँपती हैं, उस ओर शबरी निधड़क चली जाती है. गहन से गहनतर जंगली रास्तों, हिंसक पशुओं की आमद वाले इलाकों में भी वह बेहिचक परिभ्रमण करती है. इसी परिभ्रमण के दौरान उसे भालुओं का सामना करना पड़ा है जिसने उसकी एक सखी को दबोच लिया था. शबरी अपने चाकू के ताबड़तोड़ प्रहारों से अपनी सखी की रक्षा करती है. हालांकि घावों के न भर पाने के चलते कालांतर में उसका निधन हो जाता है.
बचपन में ही पशु-हिंसा के वीभत्स दृश्यों ने, शबरी के मन में इसके प्रतिकार के बीज बो दिए थे. यह बीज युवावस्था तक आते-आते बड़ा वृक्ष बन चुका है. तीन हिरन-शावकों का शिकार करने वाले युवक, जिससे उसका ब्याह होने वाला है, के प्रति उसके मन में वितृष्णा उत्पन्न हो जाती है और शबरी घर छोड़कर निकल पड़ती है उस राह पर जो अनदेखी है, अनजानी है लेकिन उसका गंतव्य वह क्षेत्र है जहाँ कोई हिंसा न होती हो. तो शबरी इस पहुँच जाती है ऋषि मतंग जी के आश्रम में, जो उसे आश्रय भी देते हैं और उसके जीवन को एक महत्वपूर्ण प्रयोजन का कारण भी बताते हैं. वे बताते हैं कि जिस आराध्य राम को वह अहर्निश स्मरण करती है, वे उसे दर्शन देने एक दिन उसकी कुटिया में स्वयं पधारेंगे. शबरी प्रफुल्लित हो जाती है, कृतकृत्य हो जाती है. उसे लगता है कि उसका जन्म अकारथ नहीं गया.
