सरदार पटेल: एकता के शिल्पी, युग के प्रेरणा
आज जब हम 21वीं सदी के भारत की ओर देखते हैं, तो सरदार पटेल की दूरदृष्टि और भी प्रासंगिक प्रतीत होती है। जिस प्रकार उन्होंने विविधता में एकता का सूत्र पिरोया, वही आज के भारत की पहचान है। जब डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, आत्मनिर्भर भारत जैसी योजनाएँ युवा पीढ़ी के सामने नए अवसर खोल रही हैं, तब पटेल का संदेश स्पष्ट है राष्ट्र निर्माण केवल नीतियों से नहीं, बल्कि चरित्र और एकता से होता है।
लखनऊ

9:25 AM, Oct 30, 2025
फीचर डेस्क
जनपद न्यूज़ टाइम्सपवन शुक्ला
सरदार वल्लभभाई पटेल भारतीय इतिहास के उन विलक्षण पुरुषों में से एक थे जिन्होंने केवल स्वतंत्रता संग्राम में योगदान नहीं दिया, बल्कि आज़ादी के बाद राष्ट्र की अखंडता और एकता को मूर्त रूप दिया। उनका जीवन सादगी, कठोर अनुशासन और अदम्य राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक था। वे भारतीय राजनीति में केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक युगद्रष्टा थे—जिन्होंने भारत को केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और सांस्कृतिक रूप से भी एक सूत्र में बाँधा।
गुजरात के नाडियाड में जन्मे सरदार पटेल ने अपने जीवन के आरंभिक वर्षों में ही संघर्ष, श्रम और आत्मनिर्भरता का महत्व समझ लिया था। वे किसान परिवार से थे, परंतु उनकी दृष्टि सीमित नहीं थी। उन्होंने अपने परिश्रम से शिक्षा प्राप्त की, और लंदन जाकर वकालत की पढ़ाई पूरी की। लौटकर जब उन्होंने अहमदाबाद में वकालत प्रारंभ की, तब तक वे न केवल एक सक्षम वकील थे बल्कि एक संवेदनशील समाजसेवी भी बन चुके थे।
खेड़ा सत्याग्रह और बारडोली आंदोलन में पटेल ने किसानों के साथ जिस दृढ़ता और संवेदना से संघर्ष किया, उसने उन्हें सरदार की उपाधि दिलाई। ब्रिटिश शासन के अन्याय के विरुद्ध उन्होंने शांतिपूर्ण लेकिन अडिग प्रतिरोध का मार्ग अपनाया। यह उनका अद्वितीय नेतृत्व था जिसमें अनुशासन और जनसमर्थन का अपूर्व संतुलन था। बारडोली के किसान केवल अपने करों की लड़ाई नहीं लड़ रहे थे, वे आत्मसम्मान की रक्षा के लिए एकजुट हुए थे—और पटेल ने उन्हें यह विश्वास दिया कि संगठित जनता किसी भी सत्ता से बड़ी होती है। यही विश्वास आगे चलकर स्वतंत्र भारत की एकता की नींव बना।
1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब देश की राजनीतिक आज़ादी अधूरी थी क्योंकि सैकड़ों रियासतें स्वतंत्र भारत में विलय करने को तैयार नहीं थीं। वह समय अराजकता, संदेह और विभाजन की भयावहता से भरा था। उस दौर में सरदार पटेल ने जो किया, वह केवल एक प्रशासनिक कार्य नहीं था, बल्कि एक असंभव को संभव बनाने की अद्भुत गाथा थी। उन्होंने अपने अद्वितीय संगठन कौशल, संवाद क्षमता और दृढ़ संकल्प के बल पर 562 रियासतों को भारत संघ में सम्मिलित किया।
जुनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर जैसी जटिल रियासतों में भी पटेल का विवेक, दृढ़ता और व्यावहारिक नीति निर्णायक सिद्ध हुई। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि - भारत की एकता केवल राजनीतिक आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मा की पुकार है। उनके निर्णयों में भावनात्मक देशभक्ति और ठोस यथार्थवाद दोनों का समन्वय था। उन्होंने कहा था — यदि देश की एकता नहीं बचेगी, तो आज़ादी का कोई अर्थ नहीं रहेगा।
आज जब हम 21वीं सदी के भारत की ओर देखते हैं, तो सरदार पटेल की दूरदृष्टि और भी प्रासंगिक प्रतीत होती है। जिस प्रकार उन्होंने विविधता में एकता का सूत्र पिरोया, वही आज के भारत की पहचान है। जब डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, आत्मनिर्भर भारत जैसी योजनाएँ युवा पीढ़ी के सामने नए अवसर खोल रही हैं, तब पटेल का संदेश स्पष्ट है राष्ट्र निर्माण केवल नीतियों से नहीं, बल्कि चरित्र और एकता से होता है।
भारत आज वैश्विक मंच पर एक उभरती शक्ति है, लेकिन भीतर से सुदृढ़ बनने के लिए सामाजिक समरसता, पारदर्शिता और जिम्मेदार नागरिकता आवश्यक है। सरदार पटेल ने प्रशासनिक दक्षता के साथ-साथ लोकसेवा की भावना पर भी बल दिया। उन्होंने सिविल सेवाओं को देश की ‘स्टील फ्रेम’ कहा था, क्योंकि वे जानते थे कि राष्ट्र का ढाँचा तभी टिकेगा जब उसमें ईमानदार और समर्पित कर्मयोगी होंगे। आज जब प्रशासन को पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की नई चुनौतियाँ झेलनी पड़ रही हैं, तब पटेल का दृष्टिकोण एक प्रेरणा है — कि सेवा का अर्थ केवल पद नहीं, बल्कि समर्पण है।
पटेल का जीवन यह सिखाता है कि नेतृत्व केवल भाषणों या लोकप्रियता का नाम नहीं, बल्कि निर्णय लेने की क्षमता और संकट में स्थिर रहने की शक्ति है। उन्होंने व्यक्तिगत स्वार्थों को हमेशा राष्ट्रीय हित के आगे रखा। यह दृष्टिकोण आज के युवा नेतृत्व के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, विशेषकर उस युग में जहाँ त्वरित प्रसिद्धि को लक्ष्य मान लिया गया है। पटेल का मार्ग बताता है कि सच्चा नेता वह है जो जनभावना को दिशा देता है, न कि उसका उपयोग करता है।
आज के भारत में जब पहचान, क्षेत्र, भाषा या विचारधाराओं के आधार पर विभाजन की प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं, तब पटेल की एकता की भावना हमें पुनः स्मरण कराती है कि “भारत एक परिवार है” — जहाँ विविधता विभाजन नहीं, बल्कि सौंदर्य है। उन्होंने कहा था, - हमारा देश एक शरीर है, प्रांत उसके अंग हैं यदि कोई अंग पीड़ित होगा तो पूरा शरीर व्यथित होगा। यह विचार आज के लोकतांत्रिक संवाद के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है जितना स्वतंत्रता के बाद था।
युवा पीढ़ी के लिए सरदार पटेल का जीवन एक दीपस्तंभ है। उन्होंने हमें यह सिखाया कि कठिन परिस्थितियों में भी नैतिकता, राष्ट्रनिष्ठा और कर्मठता को न छोड़ें। आधुनिक भारत के युवाओं के लिए उनका सबसे बड़ा संदेश यही है — अपने भीतर के नेता को जगाओ, क्योंकि राष्ट्र की शक्ति उसके युवाओं के चरित्र में बसती है।
आज जब हम सरदार@150 की स्मृति मना रहे हैं, तब यह केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी है। क्या हम उतने ही एकजुट हैं जितना वह भारत था जिसे पटेल ने जोड़ा था? क्या हमारे निर्णयों में वैसा ही साहस और विवेक है जैसा उस लौह पुरुष में था? यदि नहीं, तो यही समय है कि हम उनके आदर्शों को केवल पुस्तकों में नहीं, अपने कर्म में उतारें
सरदार पटेल ने जिस भारत का सपना देखा था, वह मजबूत, आत्मनिर्भर और एकजुट राष्ट्र था — ऐसा भारत जो अपनी संस्कृति पर गर्व करे और आधुनिकता को आत्मसात करे। आज का भारत उसी दिशा में अग्रसर है, परंतु उस पथ को प्रकाशमान रखने के लिए हमें उसी लौह इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय समर्पण की आवश्यकता है जो पटेल ने दिखाया था। उनके शब्द आज भी हमारे भीतर गूंजते हैं — एकता में ही शक्ति है, और शक्ति में ही भारत की आत्मा है।
वास्तव में, जब भी भारत अपने मार्ग पर डगमगाता है, तब सरदार पटेल का व्यक्तित्व हमें पुनः स्थिरता और संकल्प की ओर बुलाता है। वे केवल इतिहास के पन्नों के नायक नहीं, बल्कि आज के भारत के पथप्रदर्शक हैं — जो हमें याद दिलाते हैं कि राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं, बल्कि एकजुट हृदयों से बनता है।
(लेखक उच्च न्यायलय लखनऊ मे राज्य विधि अधिकारी हैँं ऐवं राष्ट्रीय विषयों पर लेखनरत हैँं)
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पवन शुक्ला (अधिवक्ता)
