अनूठी और रोचक औपन्यासिक कृति है रामजी प्रसाद भैरव की " शबरी " - विजय विनीत
उपन्यास में भैरव ने इस बात को दमदार तरीके से रखा है कि शबरी अपनी समूची जिंदगी एक भरोसा लेकर जीती रही। मतंग ऋषि का भरोसा। वह बूढ़ी हो गई, लेकिन उसने आतुरता को बूढ़ा नहीं होने दिया। वो राम की आस में पथ बुहारती रही और भगवान की राह निहारती रही। प्रतीक्षा में शबरी स्वयं प्रतीक्षा का प्रतिमान हो जाती है। जब शबरी को पता चलता है कि भगवान श्रीराम खुद उसके आश्रम में आए हैं तो वह भाव विभोर हो उठी और ऋषि मतंग

रामजी प्रसाद "भैरव"
6:38 AM, Jan 9, 2026
हमने शबरी की कथा रामायण, भागवत, रामचरित मानस और सूरसागर में पढ़ी थी, लेकिन रामजी प्रसाद भैरव की शबरी सबसे अलग है, अनूठी है और रोचक है। भैरव के उपन्यास के कथानक मर्मस्थियों के चित्रण पर ज्यादा बल देते हैं। उपन्यास की प्रवृत्ति आधुनिक है, जिसमें आंचलिकता कूट-कूटकर भरी गई है। उपन्यास में शबरी के त्यागमय प्रेम का चित्रण चुंबकीय गुण पैदा करता है।
उपन्यास में भैरव ने इस बात को दमदार तरीके से रखा है कि शबरी अपनी समूची जिंदगी एक भरोसा लेकर जीती रही। मतंग ऋषि का भरोसा। वह बूढ़ी हो गई, लेकिन उसने आतुरता को बूढ़ा नहीं होने दिया। वो राम की आस में पथ बुहारती रही और भगवान की राह निहारती रही। प्रतीक्षा में शबरी स्वयं प्रतीक्षा का प्रतिमान हो जाती है। जब शबरी को पता चलता है कि भगवान श्रीराम खुद उसके आश्रम में आए हैं तो वह भाव विभोर हो उठी और ऋषि मतंग के दिए आशीर्वाद को स्मरण करके गद्गद हो गई। अनायास राम को सामने पाकर वह उनके चरणों में लिपट गई।
शबरी की अगाध श्रद्धा और अनन्य भक्ति के वशीभूत होकर भगवान राम सहज भाव और प्रेम के साथ उसके जूठे बेर खाते रहे, मगर लक्ष्मण ने संकोच किया। ये जूठे बेर जड़ी-बूटी बनकर पहाड़ियों पर उग आए, जो बाद में भगवान राम के अनुज लक्ष्मण के लिए संजीवनी साबित हुए।
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उत्तर भारत के जाने-माने साहित्यकार रामजी प्रसाद भैरव ने इस उपन्यास के जरिए समाज को एक बड़ा संदेश दिया है। वो संदेश है सरलता का। सबके साथ कपटरहित बर्ताव का। हृदय में भरोसा रखने का। शबरी आदिवासी थी। भीलनी जनजाति से उसका नाता था। स्त्री थी, अशिक्षत थी, लेकिन उसके पास ऐसे गुण थे जिसके बल पर उसका नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों पर दर्ज हो गया। ऐसा इतिहास जो कभी मिटने वाला नहीं है।
उपन्यास में रामजी प्रसाद भैरव का मकसद शबरी की कहानी बताना भर नहीं, देश को जगाना भी है। साथ ही समाज में व्याप्त रूढ़ियों और आडंबरों को तोड़ना है। वो पाठकों को अधिक विश्वास में लेना चाहते हैं। भैरव यह बताने की कोशिश करते हैं कि शबरी की कहानी को आज भी कसौटी पर चढ़ाया जा सकता है। ऐसी कसौटी, जिसमें प्रगतिवाद और समाजवाद के स्वर फूटते हैं।
शबरी उपन्यास को लखनऊ के रश्मि प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। पुस्तक का कलेवर और साज-सज्जा बेहतरीन है। इक्कीसवीं सदी की शायद यह पहली पुस्तक है, जिसमें शबरी के जीवन चरित्र को मौजूदा परिवेश से जोड़कर समाज को नई दिशा देने के लिए उकेरा गया है। शबरी को आदर्श मानने वालों में यह उपन्यास भक्ति और निष्ठा का अलख जगाता है। आप राम भक्त हों या न हों, त्याग और भक्ति में भरोसा रखते हैं तो यह उपन्यास आपके लिए है। साहित्यकार रामजी प्रसाद भैरव चंदौली जनपद के निवासी हैं। इन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं और अनेक उत्कृष्ट सम्मान से नवाजे जा चुके हैं।
