संवेदना के धनी लेखक / कवि हैं रामजी प्रसाद " भैरव " - - केशव शरण
दुखों, विसंगतियों, विडम्बनाओं के रूप में हमारे आस-पास कथ्यों के अम्बार लगे हुए हैं जो हमारी संवेदनाओं को झकझोरते रहते हैं। ऐसे अनुभव हमें उदास भी करते हैं और आक्रोशित भी। लेखक का भावुक और सर्जक मन इसकी अभिव्यक्ति तलाशता है। यह उसकी इच्छा और क्षमता पर है कि वह इसके लिए कौन-सी विधा चुनता है। रामजी प्रसाद ' भैरव 'जी ने इसके लिए इस बार कविता को चुना है।

7:51 AM, Jan 10, 2026
रामजी प्रसाद ' भैरव ' की पहचान एक उपन्यासकार की है। उनके अब तक चार उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी नई किताब आयी है- चुप हो जाओ कबीर। लेकिन यह उपन्यास नहीं है। यह कविता संग्रह है जो एक चौंकाने वाली बात हुई। पर जो उपन्यास लिख सकता है वह कविता क्यों नहीं लिख सकता है? उपन्यास लिखना कविता से ज़्यादा कठिन और श्रमसाध्य रचनाशीलता है। बहुत-से लेखक हुए हैं जो उपन्यासकार के साथ कवि भी रहे हैं। उपन्यासकार के साथ कवि ! यह एक लेखकीय व्यक्तित्व को बहुत आकर्षक बना देता है। रामजी प्रसाद ' भैरव ' अब उपन्यासकार के साथ कवि भी गिने जायेंगे। उन्हें बधाई नवविकसित इस लेखकीय व्यक्तित्व के लिए और उनके काव्य संग्रह " चुप हो जाओ कबीर के लिए " भी।
दुखों, विसंगतियों, विडम्बनाओं के रूप में हमारे आस-पास कथ्यों के अम्बार लगे हुए हैं जो हमारी संवेदनाओं को झकझोरते रहते हैं। ऐसे अनुभव हमें उदास भी करते हैं और आक्रोशित भी। लेखक का भावुक और सर्जक मन इसकी अभिव्यक्ति तलाशता है। यह उसकी इच्छा और क्षमता पर है कि वह इसके लिए कौन-सी विधा चुनता है। रामजी प्रसाद ' भैरव 'जी ने इसके लिए इस बार कविता को चुना है। अधिकतर कविताएँ संबोधन और उद्बोधन शैली में है और उनमें भावानुरूप आक्रोश और व्यंग्य की धार है। लेकिन कहीं भी काव्य की मर्यादा से बाहर जाकर वे कविता नहीं करते। इस संग्रह का नाम " चुप हो जाओ कबीर " पढ़कर लगा कि यह क्या ! चुप हो जाओ कबीर !! कबीर को चुप रहने को क्यों कहा जा रहा है ? कबीर तो व्यक्ति और समाज के हालात पर बोलने के लिए हैं। इसके उलट एक आरोप बनता है कि ऐसे हालात के विरुद्ध कबीर क्यों चुप हैं ? कबीर यहाँ हर खरी बात कहने वाले कवि और वक्ता के प्रतीक हैं। इस शीर्षक की कविता पढ़ने के बाद हम उनके आशय और अर्थ को समझ पाते हैं। हम देखते हैं कि कबीर तो बोले जा रहे हैं और निरन्तर सबको आगाह किये जा रहे हैं लेकिन उनको सुनने और गुनने वाला कोई नहीं है। इससे मर्माहत होकर वे दुख मिश्रित व्यंग्य में कहते हैं चुप हो जाओ कबीर!
इस संग्रह की कविताएँ सरल, सहज और सरस हैं।
अपने कथ्य और अनुभव के वर्णन के साथ इन कविताओं की जनपक्षधरता सराहनीय है जिनमें कलात्मकता का सायास घालमेल नहीं है। इस संग्रह से एक कविता उद्धृत कर रहा हूँ चावल के एक दाने के रूप में जिससे इस संग्रह के रचनात्मक पकाव का थोड़ा-बहुत बोध अवश्य होगा।
संग्रह की भूमिका बहुमुखी रचना सम्पन्न डाॅ उमेश प्रसाद सिंह ने लिखी है जिन्होंने मेरे काव्य संग्रहों से मेरी कविताओं का चयन क़दम-क़दम संपादित किया है। आइए रामजी प्रसाद ' भैरव ' जी की इस कविता के साथ उनके काव्य संग्रह का स्वागत करें !
