मंटो की कहानी "शिकारी औरत" भाग - दो
मैं और मेरा एक दोस्त रेडियो स्टेशन जा रहे थे। जब हमारा तांगा अंडरक्लब हाल के पास पहुंचा तो एक तांगा हमारे पीछे से निकलकर आगे आ गया। उसमें एक बुरकापोश औरत थी, जिसकी नकाब अधखुली थी।
कहानी

7:02 AM, August 29, 2025
“मैंने आज पहली दफा तुम्हें देखा है।”
“लाल, झूठ मत बोलो—दो रोज़ से देखता हूँ।”
मैं बड़ी उलझन में गिरफ्तार हो गया—लेकिन थोड़ी देर याद में, मेरा नेकुर फजलोंटन आ गया। उसने उस तीखे नक्शों वाली याटन को अपने क़ब्ज़े में ले लिया।
यह वाकया लाहौर का है।
मैं और मेरा एक दोस्त रेडियो स्टेशन जा रहे थे। जब हमारा तांगा अंडरक्लब हाल के पास पहुंचा तो एक तांगा हमारे पीछे से निकलकर आगे आ गया। उसमें एक बुरकापोश औरत थी, जिसकी नकाब अधखुली थी।
मैंने जब उसके तरफ देखा तो उसकी आंखों में अजीब किस्म की शरारत नज़र आने लगी। मैंने अपने दोस्त से, जो पिछली सीट पर बैठा था, कहा, “यह औरत दरबदर मालूम होती है।”
“तुम ऐसे फैसले एकदम मत दिया करो।”
“बहुत अच्छा जनाब—मैं आइन्दा एहतियात से काम लूंगा।”
बुरकापोश औरत का तांगा हमारे तांगे से आगे-आगे आ रहा था। वह टकटकी लगाए हमें देख रही थी। मैं बड़ा बेकुलाहित हुआ, लेकिन उस वक्त मुझे शरारत सूझी और मैंने उसे हाथ के इशारे से सलाम अर्ज़ कर दिया।
उस आगे ढके चेहरे पर मुझे कोई प्रतिक्रिया नजर न आयी, जिससे मुझे बड़ी मायूसी हुई।
मेरा दोस्त हंसने लगा। उसको मेरी इस नाकामी से बड़ी खुशी हुई। लेकिन जब हमारा तांगा शिमला पहाड़ी के पास पहुंच रहा था तो बुरकापोश औरत ने अपना तांगा ठहरा लिया और (में ज्यादा विस्तार से जाना नहीं चाहता) वह थोड़ी उठी—नकाब के अन्दर मुस्कराती हुई आयी और हमारे तांगे में बैठ गयी—मेरे दोस्त के साथ।
मेरी समझ में न आया, क्या किया जाये। मैंने उस बुरकापोश औरत से कोई बात न की और तांगे वाले से कहा कि वह रेडियो स्टेशन का रुख करे।
मैं उसे अन्दर ले गया। डायरेक्टर साहब से मेरे दोस्ताना ताल्लुक थे। मैंने उनसे कहा, “यह खुदा बख्श रास्ते में पड़ी हुई मिल गयी। आपके पास ले आया हूं और दरख्वास्त करता हूं कि इन्हें यहां कोई काम दिलवा दीजिए।”
उन्होंने उसकी आवाज़ का इस्तेमाल करावाया जो काफी सन्तोषजनक था। जब वह ओडिशन देकर आयी तो उसने बुरका उतारा हुआ था। मैंने उसे गौर से देखा। उसकी उम्र पच्चीस के करीब होगी। रंग गोरा, आंखें बड़ी-बड़ी, लेकिन उसका जिस्म ऐसा मालूम होता था जैसे कि शकरकंदी को भाप में डालकर बाहर निकाला गया हो।
हम बात कर रहे थे कि इतने में चपरासी आया। उसने कहा, “बाहर एक तांगे वाला खड़ा है। वह किराया मांगता है।” मैंने सोचा, शायद ज्यादा वक्त गुजरने पर वह तांगा आ गया है। चुनांचे मैं बाहर निकला। मैंने अपने तांगे वाले से पूछा, “भई, क्या बात है, हम कहीं भाग तो नहीं गये।”
वह बड़ा हैरान हुआ, “क्या बात है सरकार?”
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“तुमने कहला भेजा कि मेरा किराया अब तक दो।”
“मैंने जनाब किसी से कुछ भी नहीं कहा।”
उसके तांगे के साथ दूसरा तांगा खड़ा था। उसका कोचवान, जो घोड़े को घास खिला रहा था, मेरे पास आया और बोला, “वह औरत, जो आपके साथ गयी थी, कहां है?”
“अन्दर है—क्यों?”
“जी उसने दो घंटे मुझे खराब किया है—कभी इधर जाती थी, कभी उधर—मैं तो समझता हूं कि उसका मालूम ही नहीं था कि वह कहां जाना है।”
“अब तुम क्या चाहते हो?”
“जी, मैं अपना किराया चाहता हूं।”
“मैं उससे लेकर आता हूं।”
मैं अन्दर गया। उस बुरकापोश औरत से, जो अपना बुरका उतार चुकी थी, कहा, “तुम्हारे तांगे वाला किराया मांगता है।”
वह मुस्कुरायी, “मैं दे दूंगी।”
मैंने उसका पर्स जो सोफे पर पड़ा था, उठाया—उसका खोला—मगर उसमें एक पैसा भी नहीं था। बस के चन्द टिकट थे और दो बालों की पिनें और एक वाहियात किस्म की लिपिस्टिक।
मैंने वहां डायरेक्टर के दफ्तर में कुछ कहना मुनासिब न समझा। उसने विदा मांगी। बाहर आकर उसके तांगे वाले को दो घंटे का किराया अदा किया और उस औरत को अपने दोस्त की मौजूदगी में कहा, “तुम्हें इतना तो ख्याल होना चाहिए था कि तुम्हारे तांगा किया है, और तुम्हारे पास एक कौड़ी भी नहीं।”
वह खिसियानी-सी हो गयी, “मैं...आप बड़े अच्छे आदमी हैं।”
“मैं बहुत बड़ा हूं—तुम बड़ी अच्छी हो—कल से रेडियो स्टेशन आना शुरू कर दो—तुम्हारी आमदनी की सूरत पैदा हो जायेगी—यह बकवास जो तुमने शुरू कर रखी है, उसे छोड़ दो।”
क्रमशः ....
