-चंदौली की साहित्यिक धरोहर और इतिहास -
चंदौली की साहित्यिक धरोहर की बात करें तो हमें 1997 से पीछे जाना पड़ेगा और यदि उसके बाद के साहित्यिक इतिहास की चर्चा करें तो एक महत्वपूर्ण दस्तावेज पलटना पड़ेगा । खैर , यह काम करने में मुझे गुरेज नहीं है । चंदौली को बनारस से भौगोलिक रूप से भले अलग कर दिया गया है । लेकिन मेरा मानना है , उसका आत्मीय विभाजन सम्भव नहीं है ।
साहित्य

रामजी प्रसाद "भैरव"
6:37 PM, Apr 4, 2026
रामजी प्रसाद "भैरव"
जनपद न्यूज़ टाइम्सचंदौली की साहित्यिक धरोहर की बात करें तो हमें 1997 से पीछे जाना पड़ेगा और यदि उसके बाद के साहित्यिक इतिहास की चर्चा करें तो एक महत्वपूर्ण दस्तावेज पलटना पड़ेगा । खैर , यह काम करने में मुझे गुरेज नहीं है । चंदौली को बनारस से भौगोलिक रूप से भले अलग कर दिया गया है । लेकिन मेरा मानना है , उसका आत्मीय विभाजन सम्भव नहीं है । यदि किसी राजनैतिक कारणों से कोई विभाजित कर देखने की धृष्टता करेगा तो उसे वो लौटाना पड़ेगा ,जिसे चंदौली ने दिया है । जो उसके बूते में नहीं है । बनारस से अलग होने से पूर्व चंदौली एक तहसील के रूप में था । यह ऐतिहासिक रूप से गढ़वालों द्वारा स्थापित था । बाद में वर्ष 1997 में बनारस से कट कर स्वतंत्र जिला घोषित हुआ । इससे इसके साहित्यिक विरासत को कोई आँच छू नहीं सकती । इस धरती का साहित्यिक वैभव दुनियाँ में गूँज रहा है । वैसे तो साहित्य की उस सशक्त परपरा को आज भी चंदौली के लाल अपने पूर्वजों के मान में यशोवृद्धि कर रहे हैं । जीयनपुर गाँव में जन्में डॉ नामवर सिंह ने आलोचना के क्षेत्र में अपने गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी की परंपरा को बढ़ाते हुए , आलोचना के क्षेत्र में नई लकीर खींच दी , यह लकीर इतनी बड़ी है , कि कोई उसके पास से गुजरना तो दूर , उसे छूने या मिटाने की हिमाकत नहीं कर सकता । नामवर सिंह ने लिखने से ज्यादा , बोलने में विश्वास रखा । उनके द्वारा बोला गया वाक्य , सीधे आलोचना ही होता था । उन्होंने आलोचना को व्यवहारिक बनाया । कविता के नए प्रतिमान , दूसरी परम्परा की खोज, इतिहास और आलोचना , कहानी नई कहानी , आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ , के अलावा निबन्धों का संग्रह बकलम खुद हमेशा चर्चा का विषय रहा । उन्हें कविता के नए प्रतिमान पर साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला । दूसरी ओर कथा के क्षेत्र में उनके छोटे भाई काशीनाथ सिंह ने खुद को आजमाया , केवल आजमाया ही नहीं बल्कि जब काशीनाथ सिंह लिख रहे थे , उस समय हिंदी कहानी करवट ले रही थी , उस पीढ़ी के लेखक कहानी लेखन को लेकर बहुत गम्भीर थे । बनारस में तो एक चौकड़ी ही जमती थी लेखकों की । यह भारतेंदु जी की अगली कड़ी के रूप में थी । काशीनाथ सिंह की औपन्यासिक रचनाओं में अपना मोर्चा , काशी का अस्सी , रेहन पर रग्घू , उपसंहार आदि है । कहानी संग्रहों में लोग बिस्तरों पर , सुबह का डर, आदमीनामा आदि । रेहन पर रग्घू पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला ।
वहीं शिव प्रसाद सिंह भी चंदौली की माटी से आते हैं । वह सैयदराजा के पास जलालपुर गांव में जन्में थे । अगर ये कहा जाय कि शिव प्रसाद सिंह ने साहित्य को सींचा है , तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । आज भी उनकी कहानी कर्मनाशा की हार को बच्चे पढ़ते हुए बड़े होते हैं । कर्मनाशा चंदौली में बहने वाली नदियों में एक है । जो आज भी अपनी मिथकीय अवधारणा को लेकर जीवित है । काशी को लेकर उनका उपन्यास त्रयी गली आगे मुड़ती है , वैश्वानर , अलग अलग वैतरणी ने पाठकों के हृदय को मोह लिया । नीला चाँद ,शैलूष , हनोज दिल्ली दूर अस्त आदि है । नीला चाँद पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला ।
उसी पीढ़ी के समूदपुर गाँव के महेंद्र शंकर सिंह नवगीत के प्रणेताओं में रहे , जब गीत में ठहराव आया तो सन साठ के आस पास नवगीत लिखे जाने लगे , बहुत से गीतकार नए बिम्ब , नए शिल्प के साथ आगे बढ़े , बहुतरे पीछे छूट गए । जिन्होंने चुनौतियाँ स्वीकार की , डटे रहे । उनमें से एक महेंद्र शंकर सिंह थे । लिखा तो उन्होंने बहुत है । वे छपने में जल्दबाजी नहीं करते थे । पत्र पत्रिकाओं में जीवन भर छपे लेकिन उनके नवगीतों का संग्रह मन्दिर में शंख बजे बहुत बाद में आया । उनके देहावसान के बाद उनके पुत्र एस . आनन्द ने उनकी गजलों का संग्रह मतला अर्ज है प्रकाशित कराया ।
