'सुनो आनन्द ! भगवान बुद्ध जीवन पर आधारित अनूठा उपन्यास - सुधाकर अदीब
उपन्यास की भाषा-शैली, संवाद, शब्द, वर्णन सब कुछ इतने निर्मल और सुंदर हैं कि देखते ही बनता है। उपन्यास प्रारंभ होते ही, काया से जर्जर हो चले और महातप से तेजनिष्ठ हो चुके भगवान बुद्ध जैसे ही अपने परम प्रिय शिष्य को संबोधित करते हैं - "सुनो आनन्द !" कि पाठक एक मानवमात्र न रहकर मानो एक सम्पूर्ण विश्वात्मा बन जाता है और उन परम विरक्त महान संत की अमृतवाणी के मोहपाश में आबद्ध हो बरबस इस कथा-प्रवाह में चा

रामजी प्रसाद "भैरव"
8:38 AM, Dec 19, 2025
यह रामजी प्रसाद भैरव का लिखा एक अद्वितीय हिन्दी उपन्यास है, जिसे लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद ने प्रकाशित किया है। इसमें सत्य की खोज में निरंतर परिव्राजन करने वाले परम वीतरागी गौतम बुद्ध अपनी मृत्यु से मात्र तीन माह पहले अपने असाधारण परिवर्तनशील जीवन की कथा स्वयं कहते हैं। उनकी आत्मकथा में ही अनुस्यूत उनका गहन चिंतन और जीवन दर्शन अत्यंत सरल एवं नैसर्गिक ढंग से किसी पर्वतीय झरने की भांति स्फटिक सम निर्मल जल सदृश झरता है।
उपन्यास की भाषा-शैली, संवाद, शब्द, वर्णन सब कुछ इतने निर्मल और सुंदर हैं कि देखते ही बनता है। उपन्यास प्रारंभ होते ही, काया से जर्जर हो चले और महातप से तेजनिष्ठ हो चुके भगवान बुद्ध जैसे ही अपने परम प्रिय शिष्य को संबोधित करते हैं - "सुनो आनन्द !" कि पाठक एक मानवमात्र न रहकर मानो एक सम्पूर्ण विश्वात्मा बन जाता है और उन परम विरक्त महान संत की अमृतवाणी के मोहपाश में आबद्ध हो बरबस इस कथा-प्रवाह में चाहते न चाहते उसके भीतर डूबता उतरता बह चलता है। पग-पग पर रोमांचित करता है यह उपन्यास, तेज़ी से भागते इस आधुनिक संसार में कुछ समय ठहरकर आपको कुछ सोचने पर विवश करता है यह उपन्यास। और यही इस कथाकृति की ख़ूबी है।
'सुनो आनन्द !' माता गौतमी और राजा शुद्धोधन के राजपुत्र सिद्धार्थ से सन्यासी हो चुके गौतम बुद्ध के घोर परिवर्तनशील जीवन की सांसारिक एवं आध्यत्मिक कथा है। आमजन जिसे ऊपर ऊपर से जान सके हैं, यह कथाकृति उसके अंतरतम में पैठने का एक दुर्लभ अवसर भी प्रदान करती है। गौतम बुद्ध के जीवन के अंतिम तीन महीनों में कही गई इस महागाथा में उनके हृदय की विराट व्यथा और अपार करुणा समायी हुई है। इसे बुद्ध जब आनन्द से साझा करते हैं तब गुरु-शिष्य के उन संवादों में हमें चिर अतृप्ति में भी एक अनिर्वचनीय तृप्ति की अनुभूति होती है।
लेखक स्वयं इस अद्भुत कृति की भूमिका में कहता है -- "बुद्ध ने हमें प्रेम, अहिंसा, करुणा, मैत्री का जो पाठ पढ़ाया वह आज भी प्रासंगिक है। उनके जीवन पर उपन्यास लिखना चुनौती भरा कदम था। मेरा उद्देश्य धर्म ग्रंथ लिखना नहीं था, अपितु बुद्ध के जीवन का सांगोपांग वर्णन करना था। लिखते समय मेरे मन में यह विचार अवश्य था कि एक ऐसा उपन्यास हो जो साधारण भाषा में जनसाधारण के लिए हो।" इसपर मैं कहना चाहूँगा कि लेखक अपने इस उद्देश्य में पूर्ण रूपेण सफल हुआ है।
उपन्यास के संवाद इसका प्रमुख आकर्षण भी हैं और शक्ति भी। भगवान बुद्ध जब बोलते हैं तो हमारी समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ उनके स्वर पर एकाग्र हो जाती हैं। वे आनन्द के सिर पर हाथ फेरते हुए कहते हैं - "जिसके सामने लक्ष्य होता है, उसे अपनी भावनाओं पर नियंत्रण करना पड़ता है, जैसे मैंने गृह त्याग के समय किया था।" - अथवा- "हृदय की सबसे कोमल प्रस्तुति है स्मृति, इस पर मस्तिष्क का कठोर नियंत्रण नहीं हो पाता। शायद यह अवस्था का दोष है।" ऐसे अनेक सूक्त वाक्य न केवल हमारे मार्गदर्शन में सहायक बनते हैं वरन यह कथा को भी सहज रूप में आगे बढ़ाते हैं। विषय की गंभीरता को देखते हुए भी ऐसे वाक्य कथा प्रवाह में अवरोधक नहीं, बल्कि उसके पूरक हैं। यह बड़ी बात है।
