फर्जी फाइनेंस कंपनी के जरिए करोड़ों की ऑनलाइन ठगी करने वाले अंतरराज्यीय साइबर गिरोह का पर्दाफाश
साइबर थाना चंदौली पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए फर्जी माइक्रो फाइनेंस कंपनी के नाम पर देशभर में ऑनलाइन ठगी करने वाले एक अंतरराज्यीय साइबर गिरोह का पर्दाफाश किया है। पुलिस ने महिला समेत तीन आरोपितों को गिरफ्तार किया है। गिरोह के खातों में साइबर ठगी से प्राप्त लगभग 1.42 करोड़ रुपये की धनराशि होल्ड कराई गई है।
चंदौली

3:55 PM, Jun 12, 2026
चंदौली। साइबर थाना चंदौली पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए फर्जी माइक्रो फाइनेंस कंपनी के नाम पर देशभर में ऑनलाइन ठगी करने वाले एक अंतरराज्यीय साइबर गिरोह का पर्दाफाश किया है। पुलिस ने महिला समेत तीन आरोपितों को गिरफ्तार किया है। गिरोह के खातों में साइबर ठगी से प्राप्त लगभग 1.42 करोड़ रुपये की धनराशि होल्ड कराई गई है।
पुलिस के अनुसार, साइबर शिकायतों की जांच के दौरान पता चला कि "सत्कार निधि लिमिटेड" समेत अन्य फर्जी माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के नाम पर लोगों को कम ब्याज पर ऋण दिलाने का झांसा दिया जा रहा था। आरोपित सोशल मीडिया और मोबाइल कॉल के माध्यम से लोगों से संपर्क कर लोन स्वीकृत कराने का दावा करते थे तथा प्रोसेसिंग फीस, सिक्योरिटी मनी, बीमा शुल्क और अन्य चार्ज के नाम पर धनराशि वसूलते थे।
तकनीकी जांच और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) पर उपलब्ध अभिलेखों के सत्यापन में विभिन्न राज्यों से कुल 16 साइबर शिकायतें सामने आईं। साथ ही, आरोपितों के विरुद्ध गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) में भी साइबर धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज होने की जानकारी मिली।
छापेमारी में तीन गिरफ्तार
साइबर थाना प्रभारी के नेतृत्व में गठित टीम ने मुखबिर की सूचना और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर चंदौली स्थित एक कार्यालय पर छापेमारी की। पुलिस के पहुंचते ही कुछ लोग सामान हटाकर भागने का प्रयास करने लगे, लेकिन पुलिस ने घेराबंदी कर उन्हें बजरंग लॉन के सामने से पकड़ लिया।
गिरफ्तार आरोपितों में बर्थरा बुर्द निवासी विरेन्द्र कुमार, बबुरी बाजार निवासी आशीष पटवा तथा चकिया क्षेत्र के शाहपुर गांव निवासी सोनी शामिल हैं।
ऐसे करते थे ठगी
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पूछताछ में आरोपितों ने बताया कि वे "सत्कार निधि लिमिटेड" और अन्य माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के नाम पर ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को आसान शर्तों पर ऋण दिलाने का झांसा देते थे। इसके बदले 5 हजार से 25 हजार रुपये तक विभिन्न शुल्कों के नाम पर वसूली की जाती थी।
