शिकारी औरतें
बम्बई का वाकया है, मैं अपने फ्लैट में अकेला बैठा था। मेरी बीवी शॉपिंग के लिए गयी हुई थी कि एक याटन, जो बड़े तीखे नक्शों वाली थी, बेधड़क अन्दर चली आयी। मैंने सोचा, शायद नौकरी की तलाश में आयी है, मगर वह आते ही कुर्सी पर बैठ गयी—मेरे सिगरेट केस से एक सिगरेट निकाला और उसे सुलगाकर मुस्कराने लगी।
मंटो की कहानी भाग - एक

10:09 AM, August 27, 2025
मंटो की कहानी भाग -एक
मैं आज आपको चन्द शिकारी औरतों के किस्से सुनाऊंगा। मेरा ख्याल है कि आपका भी कभी उनसे वास्ता पड़ा होगा।
मैं बम्बई में था। फिलिमस्तान से आमतौर पर बिजली-ट्रेन से छह बजे घर पहुंच जाया करता था, लेकिन उस रोज मुझे देर हो गयी। इसलिए कि “शिकारी” की कहानी पर वाद-विवाद होता रहा।
मैं जब बम्बई सेंट्रल के स्टेशन पर उतरा तो मैंने एक लड़की को देखा, जो थर्ड क्लास कम्पार्टमेंट से बाहर निकली। उसका रंग गहरा सांवला था। नाक-नक्शा ठीक-ठाक था। जवान थी। उसकी चाल बड़ी अनोखी-सी थी। ऐसा लगता था कि फिल्म का दृश्य लिख रही है।
मैं स्टेशन से बाहर आया और पुल पर विक्टोरिया गाड़ी का इन्तजार करने लगा। मैं तेज चलने का आदी हूं, इसलिए मैं दूसरे मुसाफिरों से बहुत पहले बाहर निकल आया था।
विक्टोरिया आयी और मैं उसमें बैठ गया। मैंने कोचवान से कहा कि आहिस्ता-आहिस्ता चले, इसलिए कि फिलिमस्तान में कहानी पर बहस करते-करते मेरी तबीयत परेशान हो गयी थी। मौसम सुहावना था। विक्टोरिया वाला आहिस्ता-आहिस्ता पुल पर से उतरने लगा।
जब हम सीधी सड़क पर पहुंचे तो एक आदमी सिर पर टार से ढका हुआ मटका उठाये आकर लगा रहा था, “कुल्फी कुल्फी!”
जाने क्यों मैंने कोचवान से विक्टोरिया रोकने को कहा और उस कुल्फी बेचने वाले से कहा कि एक कुल्फी दो। मैं असल में अपनी तबीयत की परेशानी किसी न किसी तरह दूर करना चाहता था।
उसने मुझे एक दोने में कुल्फी दी। मैं खाने ही वाला था कि अचानक कोई धम्म से विक्टोरिया में आन घुसा। काफी अंधेरा था। मैंने देखा तो वही गहरे रंग की सांवली लड़की थी।
मैं बहुत घबराया—वह मुस्कुरा रही थी। दोने में रखी मेरी कुल्फी पिघलना शुरू हो गयी।
उसने कुल्फी वाले से बड़े बेतकल्लुफ अंदाज में कहा, “एक मुझे भी दो!”
उसने दे दी।
गहरे सांवले रंग की लड़की ने उसे एक मिनट में चट कर दिया और विक्टोरिया वाले से कहा, “चलो!”
मैंने उससे पूछा, “कहां?”
“वहां भी तुम जाना चाहते हो!”
“मुझे तो अपने घर जाना है।”
“तो घर ही चलते।”
“तुम हो कौन?”
“कितने भोले बनते हो।”
मैं समझ गया कि वह किस कमाश की लड़की है। चुनांचे मैंने उससे कहा, “ट्रेन जाना ठीक नहीं—और यह विक्टोरिया भी गलत है—कोई टैक्सी ले लेते हैं।”
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वह मेरे इस मजाक पर बहुत खुश हुई। मेरी समझ में नहीं आता था कि उसके नजाकत कैसे हासिल करूं। उसे टक्कर देकर बाहर निकालता तो ज्वाल मच जाता। फिर मैंने यह भी सोचा कि औरत जात है। इससे फायदा उठाकर कहीं वह यह बावेला न मचा दे कि मैंने उससे अमुक मजाक किया है।
विक्टोरिया चलती रही और मैं सोचता रहा कि यह मुसीबत कैसे टल सकती है।
आखिर हम बांबे अस्पताल के पास पहुंच गये। वहां टैक्सियों का अड्डा था। मैंने विक्टोरिया वाले को उसका किराया अदा किया और एक टैक्सी ले ली। हम दोनों उसमें बैठ गये।
ड्राइवर ने पूछा, “किधर जाना है, साहब?”
मैं अगली सीट पर बैठा था। थोड़ी देर सोचने के बाद मैंने उससे मुस्कराकर कहा, “मुझे कहीं नहीं जाना है—यह लो दस रुपये—इस लड़की को जहां भी तुम ले जाना चाहो, ले जाओ।”
वह बहुत खुश हुआ।
दूसरे मोड़ पर उसने गाड़ी ठहरायी और मुझसे कहा, “साहब, आपको सिगरेट लेने वे—यहां इरानी के होटल से सस्ते मिल जायेंगे।”
मैं फौरन दरवाजा खोलकर बाहर निकला। गहरे सांवले रंग की लड़की ने कहा,
“दो पैकेट लाना।”
ड्राइवर उससे मुखातिब हुआ, “तीन ले आयेंगे।” और उसने मोटर स्टार्ट की और वह जा, वह जा।
बम्बई का वाकया है, मैं अपने फ्लैट में अकेला बैठा था। मेरी बीवी शॉपिंग के लिए गयी हुई थी कि एक याटन, जो बड़े तीखे नक्शों वाली थी, बेधड़क अन्दर चली आयी। मैंने सोचा, शायद नौकरी की तलाश में आयी है, मगर वह आते ही कुर्सी पर बैठ गयी—मेरे सिगरेट केस से एक सिगरेट निकाला और उसे सुलगाकर मुस्कराने लगी।
मैंने उससे पूछा, “कौन हो तुम?”
“तुम पहचानते नहीं?”
. क्रमशः.........

सआदत हसन मंटो
सआदत हसन मंटो
सआदत हसन मंटो का जन्म 11 मई 1912 को पंजाब के लुधियाना जिले के सम्बराला गांव में हुआ। उनके पिता ग़ुलाम हसन मंटो थे। प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर में हुई, लेकिन कुछ कारणों से इंटर तक ही पढ़ पाए। 1933 में उनकी पहली कहानी प्रकाशित हुई। बाद में उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो, दिल्ली में स्क्रिप्ट राइटर के रूप में कार्य किया और कई फिल्मों की कहानियां भी लिखीं। विभाजन के बाद वे लाहौर चले गए, जहां आर्थिक तंगी और मानसिक तनाव के कारण शराब की लत लग गई। 18 जनवरी 1955 को लाहौर में उनका निधन हो गया।
मंटो ने समाज की सच्चाइयों, गंदगी और गिरावट को बेबाकी से अपनी कहानियों में उतारा। उनकी कहानियां – 'ठंडा गोश्त', 'ऊँच नीच', 'खोल दो' आदि – समाज में बहस का विषय बनीं और उन्हें अश्लील लेखक तक कहा गया, मुकदमे चले। लेकिन उनकी रचनाओं ने सच्चाइयों को सामने लाकर विश्वव्यापी ख्याति प्राप्त की।
संकलन : एम. अफसर खान (लेखक, स्तंभकार, पत्रकार)