Gen Z बेटियाँ: क्रिकेट नहीं, क्रांति हैं

Gen-Z बेटियों के लिए यह विश्वकप किसी प्रेरणा से कम नहीं। वे अब कह सकती हैं 'मैं सिर्फ़ देखने नहीं, खेलने आई हूँ।' यह वह पीढ़ी है जो अब स्क्रीन से बाहर निकलकर मैदान पर उतर आई है — अपने पसीने को अपने सपनों की स्याही बना रही है।

लखनऊ

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9:31 AM, Nov 6, 2025

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फीचर डेस्क

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✍️ डॉ. शिवानी कटारा


मुंबई की हल्की सर्द रात में, जब डी. वाई पाटिल स्टेडियम की रोशनी आसमान से बातें कर रही थी, तभी मैदान पर इतिहास अपनी नई पारी लिख रहा था। शोर सिर्फ़ क्रिकेट का नहीं था — वह एक पीढ़ी की धड़कनों का संगम था। हर चौका, हर विकेट, हर बजती तालियाँ, यह कह रही थीं कि अब क्रिकेट सिर्फ़ एक खेल नहीं, बल्कि एक घोषणा है — कि बेटियाँ अब दर्शक नहीं, दिशा हैं। 2 नवंबर 2025 का दिन — खेल उपलब्धि से आगे बढ़कर एक प्रतीक बन गया; और जैसे ही भारत ने महिला विश्वकप ट्रॉफी थामी, दुनिया ने महसूस किया कि यह जीत सिर्फ़ मैदान की नहीं, बल्कि मानसिकता की भी थी।
भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच हुए इस फाइनल को लाइव देखने वालों की संख्या ने सभी पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स और ब्रॉडकास्टर्स के अनुसार, मैच के दौरान लाइव व्यूअरशिप 190 मिलियन से अधिक पहुँच गई — अब तक के किसी भी वर्ल्ड कप फाइनल की सबसे बड़ी संख्या। ICC के मुताबिक़, टूर्नामेंट के पहले 13 मैचों ने 60 मिलियन दर्शकों को आकर्षित किया — यह 2022 संस्करण से पाँच गुना वृद्धि थी। कुल 7 बिलियन मिनट्स का वॉच-टाइम दर्ज हुआ — 12 गुना वृद्धि।
फाइनल के विज्ञापन दरों में 40% की उछाल ने यह साफ़ कर दिया कि महिला क्रिकेट अब सिर्फ़ भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यावसायिक दृष्टि से भी शक्तिशाली मंच बन चुका। सोशल मीडिया पर यह जन-उत्सव बन गया — पहले खाली स्टेडियमों की जगह अब खचाखच भरे मैदान थे, और लाइव स्ट्रीम्स 1.2 करोड़ से बढ़कर 16.3 करोड़ तक जा पहुँचीं। क्रिकेट लीजेंड्स ने इसे 'महिला खेलों का निर्णायक मोड़ ' कहा। यह 'बेरीज़ युग’ (Berries Era) का अंत था। यह वह दौर था जब लड़कियों को खेल खेलने के लिए प्रोत्साहित तो किया जाता था, पर वह केवल एक 'गतिविधि' थी, 'करियर' नहीं। तब खेल लड़कों के लिए गंभीर और प्रतिस्पर्धी माना जाता था, जबकि लड़कियाँ घर-परिवार की भूमिकाओं तक सीमित थीं। मैदान में उनकी उपस्थिति अपवाद थी, अधिकार नहीं। लेकिन अब वह समय पीछे छूट गया है।
Gen Z बेटियां अब कह रही हैं: मैं बल्लेबाज़ बनना चाहती हूँ, मैं गेंदबाज़ बनूँगी, मैं विकेट-कीपर बनूँगी - यह परिवर्तन छोटा नहीं है, क्योंकि भाषा ही सीमाएँ निर्धारित करती थी। अब 'डॉक्टर-टीचर' के साथ 'क्रिकेटर-कोच' भी समाज की सामान्य आकांक्षा बन रहे हैं। मध्यवर्गीय परिवारों में यह बदलाव गहराई तक पहुँचा है। पहले कहा जाता था — 'थोड़ा खेल ले, फिर पढ़ाई कर।' अब वही परिवार बेटियों को कहते हैं, 'खेलो — क्योंकि तुम्हारे खेल में अब भविष्य दिखता है।' यह सिर्फ़ वाक्य नहीं, पीढ़ीयों के दृष्टिकोण का परिवर्तन है।
फाइनल की शाम शैफाली वर्मा ने जब 87 रनों की तूफ़ानी पारी खेली और दो विकेट लिए, तब उनकी आँखों में आत्मविश्वास की चमक थी। उन्होंने कहा — 'भगवान ने मुझे इसी पल के लिए भेजा था।' कप्तान हरमनप्रीत कौर ने मुस्कराकर कहा — 'जब लॉरा और सून बल्लेबाज़ी कर रही थीं, मैंने शैफाली को देखा और सोचा — अब दिल की सुननी होगी। वही निर्णय हमें जीत तक ले गया।' इन शब्दों में सिर्फ़ रणनीति नहीं, वो भरोसा था कि हर बेटी मैदान पर अपनी नियति खुद लिख सकती है — अपनी सजगता, सुझ-बुझ और अपने खेल की दृढ़ता से।
कभी कहा जाता था — Cricket is a Gentleman’s Game. लेकिन अब यह कथन अधूरा है। अब कहा जा सकता है — Cricket is Everyone’s Game. जब सचिन तेंदुलकर और रोहित शर्मा जैसे पुरुष सितारे महिला टीम को स्टेडियम में खड़े होकर चीयर करते हैं, तो यह प्रतीक है कि क्रिकेट अब किसी सीमित परिभाषा का हिस्सा नहीं। यह मानव-संभावनाओं का उत्सव है — जहाँ जुनून, अनुशासन और निडरता पहचान तय करते हैं।
यह टूर्नामेंट केवल ट्रॉफी की लड़ाई नहीं था, बल्कि आत्म-स्वीकृति का उत्सव था। Gen-Z बेटियों के लिए यह विश्वकप किसी प्रेरणा से कम नहीं। वे अब कह सकती हैं — 'मैं सिर्फ़ देखने नहीं, खेलने आई हूँ।' यह वह पीढ़ी है जो अब स्क्रीन से बाहर निकलकर मैदान पर उतर आई है — अपने पसीने को अपने सपनों की स्याही बना रही है।
देश भर में अब महिला क्रिकेट अकादमियाँ खुल रही हैं, कॉरपोरेट ब्रांड्स बेटियों को अपने अभियानों का चेहरा बना रहे हैं, और समाज खेल को अब ‘सुरक्षित विकल्प’ नहीं, ‘सशक्त अवसर’ की तरह देख रहा है। क्रिकेट अब जुनून, पेशा और प्रतिष्ठा — तीनों का संगम बन गया है।
2 नवम्बर, 2025 की यह शाम आने वाले वर्षों की दिशा तय कर गई। कल का मैच मात्र एक खेल नहीं था; वह मानसिक क्रांति का दस्तावेज़ था। जब शैफाली ने बल्ला उठाया और गेंद बाउंड्री के पार उड़ी, तो उस पल सिर्फ़ स्कोर नहीं बढ़ा  सदियों से गढ़ी गई धारणाएँ भी उड़ गईं। हर तालियों की गूंज में यह संदेश था कि अब बेटियाँ इंतज़ार नहीं करेंगी, वे पहल करेंगी। हर चमकती आँख में यह यक़ीन था कि खेल अब केवल प्रदर्शन का मंच नहीं, बल्कि परिवर्तन की परिभाषा बन चुका है। Gen Z बेटियाँ यह जान चुकी हैं कि सपने अब उधार नहीं लिए जाते  उन्हें खेला जाता है, जिया जाता है और अपने दम पर जीता जाता है।वे सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, नई विश्व चैंपियंस हैं We are the new world champions. 


(लेखिका डेंटल सर्जन हैं और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पीएचडी हैँ‌)

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Dr Shivani Katara



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