पूजा के वक्त बाबा कीनाराम के मठ में दिव्य शक्ति की होती है अनुभूति
चंदौली। जिले के रामगढ़ स्थित बाबा कीनाराम मठ बाबा की 427 वाँ जन्मोत्सव मनाया जा रहा है।तीन दिवसीय इस उत्सव में बाबा का दर्शन करने के लिए राजनीतिक से लेकर सामाजिक हस्तियों के अलावा दूर दराज से दर्शन करने आए हैं।बाबा कीनाराम का ऐतिहासिक और पौराणिक कहानी है। चन्दौली जनपद के महाईच परगना के रामगढ़ गांव में सम्वत् 1658 (सन् 1601) के भद्रमास के कृष्णपक्ष की चतुदर्शी तिथि को सूर्योदय के समय अकबर सिंह के घर
चंदौली

6:52 PM, Sep 10, 2026
चंदौली। जिले के रामगढ़ स्थित बाबा कीनाराम मठ बाबा की 427 वाँ जन्मोत्सव मनाया जा रहा है।तीन दिवसीय इस उत्सव में बाबा का दर्शन करने के लिए राजनीतिक से लेकर सामाजिक हस्तियों के अलावा दूर दराज से दर्शन करने आए हैं।बाबा कीनाराम का ऐतिहासिक और पौराणिक कहानी है। चन्दौली जनपद के महाईच परगना के रामगढ़ गांव में सम्वत् 1658 (सन् 1601) के भद्रमास के कृष्णपक्ष की चतुदर्शी तिथि को सूर्योदय के समय अकबर सिंह के घर दीर्घकाल के बाद एक पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई। कहते हैं कि पुत्र का जन्म दीर्घकाल के बाद हुआ था इसलिए पुरोहितों ने परिस्थिति काल के अनुसार उनके पिता अकबर सिंह को परामर्श दिया था कि पुत्र दीर्घजीवी हो और पृथ्वी पर अपनी कीर्ति फैलाए इसलिए इस बालक को वे किसी के हाथ बेच कर उससे (कीन) खरीद लें। पुरोहितों के इस परामर्श के अनुसार बालक का नाम भी कीनाराम रखा गया। आगे चलकर कीनाराम की आध्यात्मिक कीर्ति चारों ओर फैलती गई। शिवराशि के कारण वैष्णव लोग बाबा कीनाराम को शिवाराम के नाम से और उत्तर भारत में औघड़ संत कीनाराम और अघोरपंथ के प्रवर्तक आचार्य के रूप में जाना जाता है।
संत कीनाराम के जन्म स्थान रामगढ़ (चन्दौली) में अघोर सिद्ध पीठ है। बाबा कीनाराम की जन्म स्थली होने के कारण इस सिद्धपीठ का महत्व ज्यादा है। विशाल बरगद का वृक्ष आज भी उसी तरह तेज बरसा रहा है जैसे बाबा के साधना के वक्त था। पूजा के वक्त बाबा कीनाराम के मठ में दिव्य शक्ति की अनुभूति होती है। बाबा कीनाराम ने इस मठ में एक कूप का निर्माण कराया था। कहा जाता है कि निर्माण के समय ईंट कम हो गईं तो उन्होंने पास रखे गोहरे लगाने का आदेश दे दिया। वो आदेश भी बाबा का गोहरे ईंट में बदल गया, जो आज भी दर्शनीय है। इसे राम सरोवर के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि राम सरोवर में स्नान मात्र से रोगों से मुक्ति मिलती है। रविवार और मंगलवार को किनाराम स्नान के लिए लोगों की भीड़ लगती है। स्थानीय निवासी धनंजय सिंह बताते हैं कि बाबा एक बार इसमें कूद कर अदृश्य हो गये थे।
अघोर सिद्धपीठ रामगढ़ में बाबा का सिंहासन है और इनके पास ही इनके शिष्य बीजाराम का भी सिंहासन है, जहां आज भी उसी तरह धूनी प्रज्ज्वलित है।अघोर सिद्धपीठ रामगढ़ में प्रतिवर्ष उनके जन्म दिन पर तीन दिवसीय ‘जन्मोत्सव समारोह’ का आयोजन किया जाता है। बाबा कीनाराम जन्मोत्सव समारोह में दूर-दूर से विद्धान, गायक, संगीतकार, वादक एवं कलाकार आते हैं। जन्मोत्सव समारोह के दौरान निःशुल्क भोजन और रहने का इन्तजाम होता है। जन्मोत्सव समारोह में प्रदेश के मन्त्री, सांसद एवं विधायक समेत हजारों की संख्या में प्रबुद्ध नागरिक मौजूद रहते हैं। मठ में विशाल मन्दिर है जिसमें वर्ष भर पूजा-अर्चना का कार्यक्रम चलता है। यहां पर लोग दहेज रहित विवाह करते हैं। अघोर पंथ के प्रवर्तक बाबा कीनाराम ने समाज को सामाजिक सौहार्द व भाईचारे का पाठ पढ़ाया है। इसलिए बाबा के मठ में लोग धर्म और सम्प्रदाय से ऊपर उठ कर उनके दर्शन के लिए आते हैं। लोगों बाबा श्री कीनाराम काशी) अघोर सम्प्रदाय के अनन्य आचार्य थे। कीनाराम सिद्ध महात्मा थे और इनके जीवन की अनेक चमत्कारी घटनाएं प्रसिद्ध हैं। काशी में अघोराचार्य बाबा श्री कीनाराम जी के 170 वर्ष की आयु में समाधिस्थ हो गए।
औघड़ों के मान्य स्थल गिरनार पर किनाराम जी को दत्तात्रेय के स्वयं दर्शन हुए थे जो रुद्र के बाद औघड़पन के द्वितीय प्रतिष्ठापक माने जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि परम सिद्ध औघड़ों को भगवान दत्तात्रेय के दर्शन गिरनार पर आज भी होते है वर्तमान काल में, किनारामी औघड़पंथी परमसिद्धों की बारहवीं पीढ़ी में, वाराणसीस्थ अघोरेश्वर भगवान राम को भी गिरनार पर्वत पर ही दत्तात्रेय जी का प्रत्यक्ष दर्शन हुआ था। गिरनार के बाद किनाराम जी बीजाराम के साथ जूनागढ़ पहुँचे। वहाँ भिक्षा माँगने के अपराध में उस समय के नवाब के आदमियों ने बीजाराम को जेल में बंद कर दिया तथा वहाँ रखी 981 चक्कियों में से, जिनमें से अधिकतर पहले से ही बंदी साधु संत चला रहे थे, एक चक्की इनको भी चलाने को दे दिया। किनाराम जी ने सिद्धिबल से यह जान लिया तथा दूसरे दिन स्वयं नगर में जाकर भिक्षा माँगने लगे। वह भी कारागार पहुँचाए गए और उन्हें भी चलाने के लिए चक्की दी गई। बाबा ने बिना हाथ लगाए चक्की से चलने को कहा किंतु यह तो उनकी लीला थी, चक्की नहीं चली। तब उन्होंने पास ही पड़ी एक लकड़ी उठाकर चक्की पर मारी। आश्चर्य कि सब 981 चक्कियाँ अपने आप चलने लगीं। समाचार पाकर नवाब ने बहुत क्षमा माँगी और बाबा के आदेशानुसार यह वचन दिया कि उस दिन से जो भी साधु महात्मा जूनागढ़ आएँगे उन्हें बाबा के नाम पर ढाई पाव आटा रोज दिया जाएगा। नवाब की वंशपरंपरा भी बाबा के आशीर्वाद से ही चली।
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घर छोड़ने के बाद संत कहलाए जाने लगे कीनाराम गाजीपुर के कारों गांव से गुजर रहे थे कि रास्ते में एक बुढ़िया रोती हुई मिली। निर्धन बुढ़िया के पास एकमात्र पुत्र था जो कि जमींदार को लगान न दिये जाने के कारण दण्डित किया जा रहा था। बुढ़िया के संताप के कारण बाबा कीनाराम उस जमींदार के पास पहुंच कर उसके पुत्र को छोड़ने के लिए आग्रह करने लगे, लेकिन लोभी जमींदार ने बाबा की बात मानने से इन्कार कर दिया। तब बाबा ने जमींदार को वहीं जमीन खोदने को कहा जहां वह बालक बैठा था। जमीन खोदने पर स्वर्ण मुद्राएं मिलीं। ऐसा देख जमींदार बाबा के पैरों पर गिरकर क्षमा याचना करने लगा और बुढ़िया ने भी अपने इकलौते पुत्र को बाबा को समर्पित कर दिया। आगे चलकर यही बालक बाबा बीजाराम के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
कहा जाता है कि बाबा कीनाराम को खड़ाऊ पहन कर चलते हुए पृथ्वी पर पैर टिकने और एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचने की सिद्धि प्राप्त थी। कारों गांव से प्रस्थान कर बाबा कीनाराम गिरनार की तरफ चल दिये।
