पनीली आँखों के सपने रामजी प्रसाद " भैरव " ललित निबन्ध
कोई तो बात है जो हमारे देश के युवाओं में सपने जिंदा रखने में संजीवनी का काम कर रही है । वह है उनका जोश । युवा का सबसे मूल्यवान हथियार है । जोश में होश मिलाने पर बड़े से बड़े सपने को मूर्तिमान रूप प्रदान किया जा सकता है । पर युवाओं में इसकी तनिक कमी रहती है । होश का अभाव वास्तव में अनुभव की कमी के कारण होता है । यह उनका दोष नहीं है , उम्र का दोष है । जैसे जैसे उम्र बढ़ती है , होश भी बढ़ता है । अब बात य

रामजी प्रसाद "भैरव"
7:49 AM, Feb 11, 2026
रामजी प्रसाद "भैरव"
जनपद न्यूज़ टाइम्सहर उस आँख में सपना होना चाहिए , जो जीवित होने का प्रमाण है । सपने केवल जीवित आँखें ही देख पाती हैं । यह एकदम सच है । सौ फीसदी सच । मरी आँखें भला क्या सपना देखेंगी । हमारे देश के युवा अभी जिंदा हैं , क्यों कि उनके सपने जिंदा हैं । वो खुद अपने सपनों की बदौलत ही जिंदा हैं ।
कवि पाश मानते हैं कि " सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना । "
कोई तो बात है जो हमारे देश के युवाओं में सपने जिंदा रखने में संजीवनी का काम कर रही है । वह है उनका जोश । युवा का सबसे मूल्यवान हथियार है । जोश में होश मिलाने पर बड़े से बड़े सपने को मूर्तिमान रूप प्रदान किया जा सकता है । पर युवाओं में इसकी तनिक कमी रहती है । होश का अभाव वास्तव में अनुभव की कमी के कारण होता है । यह उनका दोष नहीं है , उम्र का दोष है । जैसे जैसे उम्र बढ़ती है , होश भी बढ़ता है । अब बात यह है कि दो तरह के लोग होते हैं । एक वो जो अपने अनुभव से सीखते हैं । दूसरे वो जो दूसरे के अनुभव से सीखते हैं । अपने अनुभव से सीखने वालों की अपेक्षा , दूसरों के अनुभव से सीखने वाले जल्दी परिपक्व व होश वाले होते हैं । इधर कुछ वर्षों में समाज में एक दोष आ गया है । सन्तानें अपने बड़े बुजुर्गों के पास बैठना नहीं चाहती । वह अपने अनुभव से सीखना चाहते हैं । नतीजन एक दुष्परिणाम भी सामने आने लगा है । पीढ़ी अंतराल यानि जेनरेशन गैप । वैचारिक अंतर की यह समस्या केवल परिवार की समस्या लेकर नहीं आता बल्कि सामाजिक समस्या लेकर भी आता हैं ।
मुझे लगता है अब समाज शास्त्रियों को भी नए सिरे से , सामाजिक समस्याओं पर काम करना चाहिए । उसे नई पीढ़ी को बताना चाहिए । सामाजिक मूल्य कोई एक दिन में खड़ी होने वाली दिवाल नहीं है । परंतु देखा जा रहा है पाश्चात्य देशों की नकल कर हम अपना नैतिक मूल्य भी खोते जा रहे है । वैसे नैतिक शिक्षा का पाठ माता पिता का धर्म होता है । माता पिता चाहें तो अपने बच्चों में इसका विकास अपनी कड़ी निगरानी में कर सकते हैं । हवा का क्या है । वह बहती हुए आगे निकल जाती है । आज नई पीढ़ी के ऊपर सामाजिक बुराई का असर जल्दी पड़ जाता है। इसे माता पिता अपने अच्छे संस्कार से रोक सकते हैं । अच्छाई और बुराई समाज में हर युग और काल में रही है । इस पर माता पिता की बड़ी सूक्ष्म दृष्टि होनी चाहिए । हमारे देश में जितने महापुरुष हुए हैं उन्होंने अपनी नैतिक उन्नयन शक्ति को बढाया है । साथ ही समाज के लिए अपने कर्मों से नए नए रास्ते खोलें हैं ।
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युवा इस बात से पूर्णतया अनभिज्ञ हैं कि सपने देख लेना महत्वपूर्ण नहीं है , बल्कि सपने पूर्ण करने का संकल्प लेना महत्वपूर्ण है । सपनों को पंख लगे । यह महत्वपूर्ण है । कल्पना की उड़ान सबसे ऊँची हो । यह महत्वपूर्ण है । सपनों को हकीकत में तब्दील करने के लिए , वैसी सोच विकसित करना महत्वपूर्ण है ।
