आप मुझे पहचानते हैं ? ललित निबन्ध रामजी प्रसाद भैरव
अगर कोई मुझसे पूछे कि आप मुझे जानते हैं । तो मेरा क्या उत्तर होना चाहिए । शायद उसे पहचानता होऊंगा तो हाँ कह दूंगा , और ना पहचानता होऊंगा तो ना । मगर मेरे समझ से यह सही उत्तर नहीं होगा । आप ने कभी बाजार में या किसी भीड़ भाड़ वाले इलाके में लोगों को , किसी को पुकारने के लिए विशेषण लगा सम्बोधन तो जरूर सुना होगा । जैसे ओ छाता , ओ टोपी , ओ गमछा आदि तो सुना ही होगा । यदा कदा स्त्रियों के मुँह से कई बार अश

6:38 PM, Feb 9, 2026
रामजी प्रसाद "भैरव"
जनपद न्यूज़ टाइम्सअगर कोई मुझसे पूछे कि आप मुझे जानते हैं । तो मेरा क्या उत्तर होना चाहिए । शायद उसे पहचानता होऊंगा तो हाँ कह दूंगा , और ना पहचानता होऊंगा तो ना । मगर मेरे समझ से यह सही उत्तर नहीं होगा । आप ने कभी बाजार में या किसी भीड़ भाड़ वाले इलाके में लोगों को , किसी को पुकारने के लिए विशेषण लगा सम्बोधन तो जरूर सुना होगा । जैसे ओ छाता , ओ टोपी , ओ गमछा आदि तो सुना ही होगा । यदा कदा स्त्रियों के मुँह से कई बार अशोभनीय सम्बोधन सुनने को मिल जाता है । अरे कलमुँही , अरे निरबंसा , हरे हरमिया आदि । इसका मतलब हम किसे जानते हैं , उस व्यक्ति को , उसके नाम को , उसके शरीर को , उसके चेहरे को आदि आदि।
मुझे एक बढ़िया प्रसंग याद आ रहा है । एक बार आदि शंकराचार्य काशी में गंगा स्नान के बाद , सीढियां चढ़ रहे थे , उतने में एक चांडाल सामने आ गया । शंकराचार्य ने कहा- हट । उसने कहा " किसे हटने को कह रहे हैं महाराज । "
शंकर ने कहा " तुमसे "
" मेरे इस अस्पृश्य शरीर को , या फिर जो इस शरीर के अंदर विराजमान है उससे । "
चांडाल के प्रश्न सुनकर शंकराचार्य हतप्रभ हो गए । उनकी चेतना चांडाल के प्रश्न पर निरुत्तर ही नहीं हुई , बल्कि उन्हें बोध हुआ कि यह उनके अद्वैत को परिभाषा इसी चांडाल ने दी । वह उसके पैरों में गिर पड़े । अगले क्षण वहाँ भगवान शिव खड़े मिले । शिव ने कहा -" तुम्हारा अद्वैत यहाँ खंडित होने जा रहा था । मुझे समझाने के लिए आना पड़ा । "
अगर शंकराचार्य के अद्वैत को कोई समझे तो कौन किसे जनता है । जिसे जानता है वह कौन है , जिसे नहीं जानता उसके बारे में इतना दम्भ क्यों । क्या मनुष्य शुरू से इतना भृमित है ।
गीता में भगवान कृष्ण से कहा -" मारने वाला भी मैं हूँ और मरने वाला भी मैं ही हूँ । तुम केवल निमित्त मात्र हो ।"
अब देखिए न , मनुष्य अपनी पहचान के लिए नहीं जीता , बल्कि अपने नाम के पहचान के लिए जीता है । समस्त कर्म नाम के लिए करता है । अगर हम आध्यात्मिक अर्थो में लें तो कर्म के तीन रूप होते हैं । संचित कर्म , प्रारब्ध कर्म और क्रियमाण कर्म । जो कर्म मनुष्य के जीवन जीने के बाद , अच्छे या बुरे भोग से बच जाते हैं । वह मनुष्य का संचित कर्म है । यही संचित कर्म अगले जन्म में प्रारब्ध कर्म बन जाता है । उसे ही साधारण शब्दों में भाग्य कहा जाता है । क्रियमाण कर्म वर्तमान जीवन का कर्म होता है । यदि मनुष्य को थोड़ी चेतना हो तो प्रारब्ध के बुरे कर्मों को सुधार सकता है । चूंकि मनुष्य को पिछले जन्मों की स्मृति नहीं रहती इसलिए वह इन बातों को समझने से वंचित रहता है । हर जन्म में नया नाम पाता है । जाति और धर्म भी अपनी सुविधा के लिए बना लिए हैं । उसे प्रारब्ध का बोध हो भी तो कैसे । गीता में भगवान कृष्ण ने इसी अज्ञानता से दूर जाने का एक सरल तरीका सुझाया है । वे कहते हैं "कर्म करो , फल की चिंता मुझ पर छोड़ दो । "
