कांग्रेस मुक्त भारत का अधूरा सपना
भारतीय राजनीति की बुनियाद यही है कि कोई भी पार्टी हमेशा अकेली नहीं चल सकती। भाजपा की कोशिश रही कि वह कांग्रेस को हाशिये पर धकेल दे, लेकिन कांग्रेस ने खुद को विपक्षी एकता के केन्द्र के रूप में फिर से स्थापित कर लिया है। हाल ही में दिल्ली में हुई विपक्षी नेताओं की बैठक इसका स्पष्ट संकेत देती है। वहां चर्चा का मुख्य विषय यही था कि भाजपा को कैसे रोका जाए और जनहित के मुद्दों पर जनता के सामने एक वैकल्पि
राजनीति

4:51 PM, August 28, 2025
एम. अफसर खान
सियासत में नारे भीड़ को खींचने और माहौल बनाने के लिए गढ़े जाते हैं। कभी ये नारे जनभावनाओं की धड़कन बन जाते हैं, तो कभी वक्त के साथ फीके पड़ जाते हैं। भाजपा का दिया गया ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा भी अब उसी कसौटी पर खड़ा दिख रहा है, जहां दावे और हकीकत के बीच की खाई साफ़ नजर आती है।
सितंबर 2022 में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने दक्षिण भारत के कन्याकुमारी से एक नई पहल की ‘भारत जोड़ो यात्रा’। 136 दिनों तक चलने वाली इस ऐतिहासिक पदयात्रा ने 14 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को छुआ। यह केवल एक यात्रा नहीं थी, बल्कि संवाद, संपर्क और सियासी संदेश देने का अभियान था। राहुल गांधी ने साफ कहा था कि भाजपा का ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा केवल सत्ता की राजनीति का हथकंडा है, जबकि ‘भारत जोड़ो’ का मक़सद लोगों को जोड़ना और देश की आत्मा को मजबूत करना है।
आज, जब हम इस यात्रा के असर को देखते हैं, तो तस्वीर साफ़ होती है कांग्रेस पार्टी अब भी भारतीय राजनीति में प्रासंगिक है। उसके लिए खत्म होने की बातें सिर्फ़ बयानबाज़ी साबित हुईं। राज्यसभा चुनाव नतीजों ने इसे और मजबूती से सामने रखा है। भाजपा को विपक्षी एकजुटता के सामने कई राज्यों में कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा। कांग्रेस, झामुमो, एनसीपी, शिवसेना, आरजेडी, आप और वामपंथी दल अब पहले से ज्यादा संगठित नजर आते हैं। बिहार में SIR के मुद्दे पर संसद से लेकर सड़क तक इंडिया गठबन्धन एकजुट और मुखर है।
भारतीय राजनीति की बुनियाद यही है कि कोई भी पार्टी हमेशा अकेली नहीं चल सकती। भाजपा की कोशिश रही कि वह कांग्रेस को हाशिये पर धकेल दे, लेकिन कांग्रेस ने खुद को विपक्षी एकता के केन्द्र के रूप में फिर से स्थापित कर लिया है। हाल ही में दिल्ली में हुई विपक्षी नेताओं की बैठक इसका स्पष्ट संकेत देती है। वहां चर्चा का मुख्य विषय यही था कि भाजपा को कैसे रोका जाए और जनहित के मुद्दों पर जनता के सामने एक वैकल्पिक चेहरा कैसे पेश किया जाए।
झारखंड और कर्नाटक के नतीजों को देखें, तो यह साफ है कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने भाजपा की जमीन खिसकाने की पूरी कोशिश की और कई जगह सफलता भी पाई। भाजपा का यह मान लेना कि ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ एक आसान लक्ष्य है, अब वास्तविकता से दूर लगता है। इन राज्यों में विपक्ष की मजबूती ने साफ कर दिया है कि जनता के बीच विकल्प की तलाश हमेशा रहती है और भाजपा के लिए यह समझना जरूरी है कि सत्ता में बने रहने के लिए केवल पुराने नारों का सहारा काफी नहीं है।
राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे नेताओं ने विपक्षी खेमे में नई ऊर्जा और आत्मविश्वास भरा है। जनता से सीधा संवाद, पदयात्राएं, जनसभाएं और लगातार मुद्दों पर बोलने की आदत ने कांग्रेस को फिर से चर्चा में ला दिया है।
दरअसल, भारतीय मतदाता समझदार है। वह बदलाव चाहता है, लेकिन आंख मूंदकर किसी नारे के पीछे नहीं चलता। भाजपा का ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा उस दौर में दिया गया था जब कांग्रेस कई राज्यों में सत्ता से बाहर थी और उसकी सियासी ताकत कमजोर लग रही थी लेकिन राजनीति में हालात स्थायी नहीं होते। जनता मुद्दों और हालात के हिसाब से अपना फैसला बदलती है। यही वजह है कि आज कांग्रेस फिर से विपक्षी राजनीति के केंद्र में है।
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कांग्रेस के लिए ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ नारे की चुनौती अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन हालात यह बताते हैं कि पार्टी अब भी भारतीय राजनीति में प्रासंगिक है और कई मोर्चों पर सक्रिय दिखाई देती है। दिल्ली और छत्तीसगढ़ जैसे चुनावों में भाजपा का दबदबा रहा, वहीं हरियाणा में कांग्रेस ने कड़ी टक्कर दी और विपक्षी एकजुटता के केंद्र में खुद को स्थापित किया। राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ और वोट अधिकार यात्रा ने कांग्रेस में नई ऊर्जा और जनसंवाद की ताक़त भरी, जिसने उसे राज्यसभा चुनावों, विपक्षी बैठकों और रणनीतिक गठबंधनों में एक मजबूत आवाज़ बनने का मौका दिया। पंजाब जैसे राज्यों में गुटबाजी और उपचुनावों में हार जैसी चुनौतियाँ मौजूद हैं, लेकिन शीर्ष नेतृत्व लगातार यह संदेश दे रहा है कि 2027 के विधानसभा चुनावों तक संगठन को एकजुट करना और नई रणनीति के साथ मैदान में उतरना ही सफलता की कुंजी है। भाजपा का ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ नारा अब केवल एक राजनीतिक चुनौती के रूप में रह गया है, जबकि कांग्रेस मुद्दों, गठबंधनों और नए चेहरों के सहारे धीरे-धीरे अपनी ज़मीन मजबूत करने में लगी है और मतदाताओं के बीच फिर से भरोसा हासिल करने की कोशिश कर रही है।
भाजपा का ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का सपना अब जनता की कसौटी पर खरा नहीं उतर पा रहा है। यह नारा न तो राज्यों में कांग्रेस को खत्म कर पाया, न ही विपक्षी दलों की ताकत को कमजोर कर सका। उल्टे, इसने विपक्ष को एकजुट होने का मौका दिया। आज के हालात भाजपा को मजबूर कर रहे हैं कि वह नए मुद्दों पर, नई सोच के साथ जनता तक पहुंचे। बिहार का चुनाव भाजपा के लिए केवल सत्ता बचाने की जंग नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक समझ और रणनीति की नई परीक्षा भी है। एक शेर है -
क़दम क़दम पे नई मंज़िलों का है ऐलान,
जो रुक गया वो कारवाँ से बाहर हुआ।

एम अफसर खान
(लेखक स्तंभकार और पत्रकार हैं)