बाबा कीनाराम की सिद्धि और चमत्कार आज भी प्रसिद्ध
चन्दौली । बाबा कीनाराम की जन्मोत्सव की धूम जनपद में चल रही है।हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन बाबा के दरबार में मत्था टेक उनका आशीर्वाद ले रहे हैं।जनपद ही देश के कोने कोने से भी श्रद्धालु बाबा का दर्शन करने को आतुर हैं।तीन दिवसीय इस आयोजन में पूजा पाठ, संस्कृतिक कार्यक्रम,भंडारा चल रहा है।श्रद्धालु बाबा के तपोभूमि में नतमस्तक हैं।
चंदौली

10:12 AM, Sep 12, 2026
चन्दौली । बाबा कीनाराम की जन्मोत्सव की धूम जनपद में चल रही है।हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन बाबा के दरबार में मत्था टेक उनका आशीर्वाद ले रहे हैं।जनपद ही देश के कोने कोने से भी श्रद्धालु बाबा का दर्शन करने को आतुर हैं।तीन दिवसीय इस आयोजन में पूजा पाठ, संस्कृतिक कार्यक्रम,भंडारा चल रहा है।श्रद्धालु बाबा के तपोभूमि में नतमस्तक हैं।बाबा की चमत्कार और सिद्धि काफी प्रसिद्ध है। जिले के रामगढ़ में अघोर पंथ के प्रतिस्थापक स्वामी कीनाराम महाराज का जन्म हुआ था. इनके पिता का नाम अकबर सिंह और मां का नाम मनसा देवी था. इनके जन्मतिथि के बारे में कुछ भ्रम है, लेकिन 1693 में इनका जन्म बताया जाता हैं. इनके माता-पिता की कोई संतान जीवित नहीं रहती थी, तो लोगों ने कहा कि इस बच्चे की खरीद बिक्री कर दीजिए. ऐसी पहले की परंपरा भी थी, तो उनका नाम कीनाराम हो गया। उनका ब्याह 12 साल की उम्र में हो गया।पत्नी के मृत्यु के बाद इस महान तपस्वी के जीवन की कहानी बलिया जनपद से शुरू हुई। जिले के कामेश्वर धाम कारों में इनकी मुलाकात अघोर पंथ के जाने माने संत शिवाराम से हुई।कीनाराम ने शिवाराम से दीक्षा लेकर उन्हें अपना प्रथम गुरु बना लिया। अंत में कीनाराम की कीर्ति देश दुनिया फैल गई. आपको बता दूं कि अघोर मतलब जो घोर यानी जटिल न हो, सरल, शांत, सहज और शिव के उपासक को अघोर कहा जाता है।
बचपन में ही लगभग 10 साल की अवस्था में इनका विवाह कात्यायनी देवी के साथ कर दिया गया, लेकिन जब विदाई होना था। तो उन्होंने अपने परिवार के लोगों से कहा कि आप लोग मत जाइए दुल्हन मर गई है। यह सच हुआ और उनकी पत्नी का देहांत हो चुका था।यहीं से इनको वैराग्य हो गया और यह सबकुछ छोड़कर निकल पड़े।
कीनाराम चलते-चलते बलिया जनपद के सदर तहसील अंतर्गत कारों गांव में पहुंच गए इसे कामेश्वर धाम कारो या काम दहन भूमि भी कहा जाता है। यहीं पर भगवान शंकर ने तपस्या किया था। यहां प्राचीन काल में राम, लक्ष्मण और विश्वामित्र भी आए थे. जब कीनाराम यहां आए उस समय इस मठ पर तत्कालीन महंथ शिवाराम महाराज थे। कीनाराम की पहली दीक्षा गुरु शिवराम ने दिया. आज भी कारों में शिवाराम की समाधि स्थल है, जहां अघोर पंथ के सभी बड़े-बड़े संत महात्मा आते है. यहां से कीनाराम सीधे हिंगलाज भवानी गए, इसके बाद वह वाराणसी तपस्या के लिए आ गए, जो आज कीनाराम आश्रम स्थल या क्रीं कुंड के नाम से देश दुनिया में मशहूर हुआ है।
बाबा कीनाराम जी की चमत्कारी सिद्धियाँ
लगभग दो सौ वर्ष पहले काशी में बाबा कीनाराम नाम के एक सिद्ध तांत्रिक अवोरी निवास करते थे। जिनकी सिद्धियों की अनेकों घटनाएँ आज भी लोक प्रसिद्ध हैं। कुछ तो ऐतिहासिक महत्व की है। कुछ अलौकिक घटनाओं का वर्णन यहाँ किया जा रहा है।
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वावा एक गाँव से जा रहे थे। उस गाँव के जमींदार का यह नियम था कि जो व्यक्ति जमींदारी समय पर जमा नहीं कर सकता, उसे वे लगातार कोड़े मरवाने का दण्ड देते थे जब तक कि उसके शरीर का अन्त न हो जाय। वावा ने उस गाँव की एक वृद्धा स्त्री को रोते चिल्लाते हुए देखा। कारण पूछने पर पता चला कि सूखे के कारण उसका लड़का जमींदारी जमा नहीं कर पाया है। उसके शरीर पर भी आज कोड़े पड़ेंगे और उसका एक मात्र सहारा टूट जायेगा । बाबा ने वृद्धा को आश्वासन दिया। बावा जमींदार के पास गये और उस लड़के को क्षमा करने का अनुरोध किया परन्तु धन के मद से फूला जमींदार एक साधु की बात कब मानने वाला था। वह न माना । बाबा एक पेड़ के नीचे बैठकर मन्त्रों का उच्चारण करने लगे। जब लड़के को कोड़े मारे जाने लगे तो वहाँ उपस्थित लोगों ने आश्चर्य चकित होकर देखा कि कोड़े मारे तो उस लड़के को जारहे हैं परन्तु उनका प्रभाव जमींदार की पीठ पर पड़ रहा है। जमीदार चिल्लाया और कोड़े रोकने का आदेश दिया परन्तु रोकते-रोकते भी तीन कोड़े लड़के को मार ही दिये गये जमींदार की पीठ पर तीन कोड़ों के निशान देखे गये । जमींदार ने उस लड़के को छोड़ दिया और बाबा से क्षमा माँगी ।
वाराणसी के ईश्वर गंगी-मौहल्ले में एक परम वैष्णव लोटा बाबा निवास करते थे। हर वर्ष एक बड़ा भण्डार आयोजित करने का उनका नियम था जिससे हजारों साबुओं को निमन्त्रित करके स्वादिष्ट पकवान खिलाते और पीतल का लोटा दक्षिणा में देते थे। बाबा कीना- राम भी वाराणसी में ही रहते थे परन्तु लोटा बाबा ने उन्हें अपने भण्डारे में कभी निमन्त्रित नहीं किया। एक बार भण्डारा चल रहा था । बाबा स्वयं ही मण्डारे के निकट एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गये, निमन्त्रित अतिथियों को पत्तलों पर सभी प्रकार के बनाये गये व्यंजन परोस दिए गये और साधु समाज की सामूहिक कीर्तन ध्वनि से आकाश गूंजने लगा । कीर्तन के बाद साधु वर्ग भोजन आरम्भ करना ही चाहता था। परन्तु सभी को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि सभी साधुओं के हाथ काठ से हो गये हैं। वावा अघोरी तो थे ही पत्तलों पर मिठाई और पकवान के स्थान पर माँस और मछली देखे गये और जल के स्थान पर कुल्हड़ों में शराव । मण्डारे की सारी सामग्री भ्रष्ट हो चुकी थी। लोटा बाबा अत्यन्त चिंतित हुए । एक साधु ने उन्हें स्थान पर मांस और मछली देखे गये आर
जल के स्थान पर कुल्हड़ों में शराव । भण्डारे की सारी सामग्री भ्रष्ट हो चुकी थी। लोटा बाबा अत्यन्त चिंतित हुए । एक साधु ने उन्हें सूचना दी कि बाबा कीनाराम निकट ही पीपल के पेड़ के नीचे बैठे हुए हैं। आपने उन्हें निमन्त्रित न करके जो अपमान किया है, उसी से वे क्रोधित हैं और यह भोज्य सामग्री का भ्रष्ट होना उन्हीं के क्रोध का परिणाम है। कुछ साधु बाबा के पास गये और भण्डारे में सम्मि- लित होने का अनुरोध किया। परन्तु उन्होंने कहा कि जब तक लोटा वावा स्वयं निमंत्रित न करें तब तक वहाँ जाना किसी भी प्रकार उचित नहीं है। लोटा बाबा स्वयं आए और बाबा कीनाराम से क्षमा माँगने लगे । बाबा भण्डारे में गये, जो भोज्य सामग्री माँस, मछली और शराब में परिर्वार्तत हो गई थी वह पुनः मिष्ठान और पकवान के रूप में पूर्ववत् हो गई और समस्त साधु वर्ग ने प्रेम-पूर्वक भोजन किया ।
एकवार बाबा कीनाराम और सन्त कालूराम दोनों एक साथ गंगा किनारे जा रहे थे। सन्त कालूराम ने गङ्गा में बहती किसौ वस्तु की ओर संकेत करते हुए कहा "देखो किसी का मृतक शरीर बहता आ रहा है।" बावा कीनाराम ने तुरन्त उत्तर दिया "यह मृतक नहीं जीवित है।" इस पर सन्त कालूराम ने उस तथाकथित जीवित को बुलाने का अनुरोध किया । बाबा ने दूर से आवाज दी इधर आओ। आश्वर्ज कि मृतक शरीर में प्राणों का संचार हो गया और वह मृतक उठकर खड़ा हो गया । बाबा ने पुनः उसे घर जाने का आदेश दिया तो वह अपने घर की ओर पग बढ़ाने लगा। मृतक से जीवित होने के इस चमत्कार का श्रेय बाबा की मन्त्र साधना को ही है।
