वैराग्य और साधना का अद्भुत समन्वय है बाबा कीनाराम जन्मोत्सव
चंदौली। रामगढ़ स्थित बाबा कीनाराम स्थली पर अघोर चतुर्दशी के अवसर पर बाबा कीनाराम का 427वां जन्मोत्सव तीन दिनों तक श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालु बाबा की समाधि और जन्मस्थली पर दर्शन-पूजन कर उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प ले रहे हैं। ऐतिहासिक रामगढ़ की धरती पर आयोजित यह उत्सव वैराग्य, साधना और लोककल्याण के अद्भुत समन्वय का प्रतीक माना जाता है।

10:30 AM, Sep 11, 2026
रामगढ़ में तीन दिवसीय जन्मोत्सव में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब, अघोर परंपरा और लोककल्याण का संदेश दे रहे बाबा कीनाराम के विचार
चंदौली। रामगढ़ स्थित बाबा कीनाराम स्थली पर अघोर चतुर्दशी के अवसर पर बाबा कीनाराम का 427वां जन्मोत्सव तीन दिनों तक श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालु बाबा की समाधि और जन्मस्थली पर दर्शन-पूजन कर उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प ले रहे हैं। ऐतिहासिक रामगढ़ की धरती पर आयोजित यह उत्सव वैराग्य, साधना और लोककल्याण के अद्भुत समन्वय का प्रतीक माना जाता है।
अघोर पंथ के महान संत बाबा कीनाराम का जीवन और दर्शन मानवता की सेवा, समभाव और सामाजिक कुरीतियों से मुक्ति का संदेश देता है। अघोर परंपरा में साधना का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत आध्यात्मिक उन्नति नहीं, बल्कि समाज और मानव जीवन के कल्याण से भी जोड़ा जाता है। बाबा कीनाराम ने इसी विचार को अपने जीवन में प्रमुखता दी।
वैराग्य के साथ लोककल्याण की साधना
मान्यता है कि बाबा कीनाराम बचपन से ही सांसारिक मोह-माया से विरक्त थे। उन्होंने शिव-शक्ति की उपासना और साधना का मार्ग अपनाया। अघोर परंपरा में श्मशान जैसी जगहों को साधना स्थली बनाए जाने का उल्लेख मिलता है, जो सांसारिक मोह, राग-द्वेष और भेदभाव से मुक्ति का प्रतीक माना जाता है।
बाबा कीनाराम की साधना का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी माना जाता है कि उनका वैराग्य समाज से दूरी बनाने वाला नहीं था, बल्कि लोककल्याण से जुड़ा था। उनके जीवन से जुड़ी कथाओं में जरूरतमंदों की सहायता, सामाजिक कुरीतियों के विरोध और मानव सेवा के अनेक प्रसंग मिलते हैं।
समत्व भाव अघोर साधना का मूल संदेश
बाबा कीनाराम के दर्शन में समत्व भाव को विशेष महत्व दिया जाता है। अघोर परंपरा के अनुसार मनुष्य को जाति, वर्ग, ऊंच-नीच और अन्य भेदभाव से ऊपर उठकर प्रत्येक जीव में ईश्वर का अंश देखना चाहिए। यही विचार आज भी बाबा कीनाराम के अनुयायियों को मानवता और सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
जन्मोत्सव के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु रामगढ़ पहुंचते हैं। प्रार्थना, पूजन, सेवा और साधना के माध्यम से श्रद्धालु बाबा की शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लेते हैं।
1609 में जन्म की मान्यता
अघोर परंपरा में बाबा कीनाराम का विशेष स्थान माना जाता है। परंपरागत मान्यता के अनुसार उनका जन्म वर्ष 1609 में चंदौली के रामगढ़ गांव में हुआ था और उन्होंने 1769 तक जीवन व्यतीत किया। अघोर साधकों के बीच उन्हें महान आचार्य के रूप में श्रद्धा से स्मरण किया जाता है।
बाबा कीनाराम के जीवन से जुड़ी अनेक घटनाएं और चमत्कार कथाएं लोकमानस में प्रचलित हैं। हालांकि इन घटनाओं का उल्लेख मुख्यतः धार्मिक परंपराओं और जनश्रुतियों में मिलता है।
पत्नी की मृत्यु का पूर्वाभास होने की जनश्रुति
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बाबा कीनाराम के जीवन से जुड़ी एक प्रसिद्ध जनश्रुति के अनुसार, उनका विवाह कम उम्र में कर दिया गया था, जबकि वे गृहस्थ जीवन के प्रति इच्छुक नहीं थे। कहा जाता है कि एक दिन उन्होंने अपनी मां से हठपूर्वक दूध-चावल मांगकर खाया। अगले दिन उनकी पत्नी के निधन का समाचार मिला। इस घटना को बाबा कीनाराम की आध्यात्मिक शक्ति से जोड़कर देखा जाता है।
सनातन परंपरा में मृतक संस्कार के बाद दूध-चावल से जुड़े कर्मकांड का भी उल्लेख मिलता है। इसी कारण यह घटना बाबा कीनाराम से जुड़ी लोककथाओं में विशेष रूप से कही जाती है।
गुरु से मिली दीक्षा की कथा भी है चर्चित
मान्यता के अनुसार बाद में बाबा कीनाराम कामेश्वर धाम पहुंचे और वहां रामानुजी संप्रदाय के संत शिवराम की शरण ली। कहा जाता है कि दीक्षा से पूर्व गुरु ने उनकी परीक्षा लेने के लिए उन्हें पूजा-सामग्री लेकर गंगातट की ओर जाने को कहा।
जनश्रुति के अनुसार बाबा गंगातट से कुछ दूरी पर रुककर गंगा को प्रणाम करने लगे। सिर उठाने पर उन्होंने देखा कि गंगा का जल बढ़कर उनके चरणों तक पहुंच गया। बाबा ने इसे गुरु की महिमा माना। दूर से यह दृश्य देख रहे संत शिवराम ने उन्हें असाधारण साधक मानते हुए दीक्षा प्रदान की।
गरीब युवक की मुक्ति से जुड़ी कथा
बाबा कीनाराम के जीवन से जुड़ी एक अन्य लोककथा नईडीह गांव की बताई जाती है। कहा जाता है कि साधना के दौरान उन्होंने एक वृद्ध महिला को रोते हुए देखा। महिला ने बताया कि लगान न देने के कारण जमींदार के सिपाहियों ने उसके इकलौते पुत्र को पकड़ लिया है।
जनश्रुति के अनुसार बाबा उस वृद्धा के साथ जमींदार के पास पहुंचे और युवक को मुक्त करने का आग्रह किया। जमींदार के नहीं मानने पर बाबा ने कथित रूप से उस स्थान की जमीन खुदवाने की बात कही जहां युवक बैठा था। कथा के अनुसार खुदाई में धन मिलने के बाद जमींदार ने युवक को मुक्त कर दिया और बाबा से क्षमा मांगी।
कहा जाता है कि बाद में उस युवक का नाम बीजाराम रखा गया और वह बाबा कीनाराम का शिष्य बना। परंपरा में यह भी माना जाता है कि बाबा की समाधि के बाद बीजाराम ने वाराणसी स्थित उनके मठ की गद्दी संभाली।
आज भी आस्था का प्रमुख केंद्र है रामगढ़
बाबा कीनाराम जन्मस्थली रामगढ़ आज अघोर साधना और आस्था का प्रमुख केंद्र मानी जाती है। जन्मोत्सव के दौरान देश के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला जारी रहता है। बाबा कीनाराम के अनुयायी उनकी शिक्षाओं को आत्मसात करते हुए सेवा, समभाव और साधना को जीवन का आधार बनाने का संकल्प लेते हैं।
बाबा कीनाराम जन्मोत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि वैराग्य और साधना के माध्यम से मानवता की सेवा तथा सामाजिक समरसता का संदेश देने वाला पर्व भी माना जाता है।
